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भगवान नर-नारायण कामदेव, वसंत तथा अप्सराओं की भाव-भंगिमाओं दिव्य नेत्रों से देख रहे थे. फिर उन्होंने नेत्र खोले तो सभी शाप के भय से कांपने लगे.

उनकी यह दशा देखकर भगवान नर नारायण ने उन्हें सांत्वना दी और कहा- तुम लोगों को भय करने की तनिक भी जरूरत नहीं. हम प्रेम से इस तपोभूमि में तुम्हारा स्वागत करते हैं.

कामदेव अत्यन्त लज्जित हुए. उन्होंने क्षमा मांगते हुए कहा कि वह देवराज इंद्र के सेवक हैं और उनके आदेश में बंधे हैं. ये अप्सराएं भी उनके अधीन है. हमने उनके आदेश पर ऐसी धृष्टता की.

कामदेव बोले- आप निर्विकार परम तत्व हैं। आपके चरण कमलों की सेवा से आत्मज्ञानी कामविजयी हो जाते हैं. आप देवाधिदेव नारायण हैं इसलिए काम क्रोधादि विकारों से आप परे हैं. हम पर आपकी कृपा बनी रहे.

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