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महाराज ने स्वप्न में जिस प्रभु विग्रह के बारे में देववाणी सुनी थी, वह यही भगवान नीलमाधव हैं. किसी तरह इसी विग्रह को लेकर राजधानी पहुंचना होगा.
विद्यापति गुफा से मूर्ति लेकर जाने की सोच तो रहे थे, पर भीलराज से विश्वासघात के विचार से मन व्यथित भी था. विद्यापति धर्म-अधर्म के बारे में सोचते रहे. फिर विचार आया, यदि विश्वावसु ने सचमुच विश्वास किया होता तो आंखों पर पट्टी बांधकर गुफा तक नहीं ले जाते. इसलिए उनके साथ विश्वासघात का प्रश्न नहीं उठता.
विद्यापति ने गुफा से मूर्ति चुराने का निश्चय कर ही लिया.
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विद्यापति ने ललिता से कहा कि वह अपने माता-पिता के दर्शन के लिए जाना चाहता है. वे उसे लेकर परेशान होंगे. ललिता भी साथ चलने को तैयार हुई. विद्यापति ने यह कहकर समझा लिया कि वह शीघ्र ही लौटेगा तो उसे लेकर जाएगा.
ललिता मान गई. विश्वावसु ने उसके लिए घोड़े का प्रबंध किया. अब तक सरसों के दाने से पौधे निकल आए थे. उनको देखता विद्यापति गुफा तक पहुंच गए. भगवान की स्तुति की और क्षमा प्रार्थना के बाद मूर्ति उठाकर झोले में रख ली.
लंबे सफर के बाद वह राजधानी पहुंच गए और सीधे राजा के पास गए. दिव्य प्रतिमा राजा को सौंप दी और पूरी कहानी सुनायी. राजा ने बताया कि उसने कल एक सपना देखा कि सुबह सागर में एक लकड़ी का कुन्दा बहकर आएगा.
उस कुंदे की नक्काशी करवाकर भगवान की मूर्ति बनवा लेना जिसका अंश तुम्हें प्राप्त होने वाला है. वह भगवान श्रीविष्णु का स्वरूप होगा. तुम जिस मूर्ति को लाए हो वह भी भगवान विष्णु का अंश है. दोनों आश्वस्त थे कि उनकी तलाश पूरी हो गई है.
राजा ने कहा- जब भगवान द्वारा भेजी लकड़ी से हम इस प्रतिमा का बड़ा स्वरूप बनवा लेंगे तब तुम अपने ससुर से मिलकर उन्हें मूर्ति वापस कर देना. उनके कुलदेवता का विशाल विग्रह एक भव्य मंदिर में स्थापित देखकर उन्हें खुशी ही होगी.
दूसरे दिन सूर्योदय से पूर्व इंद्रद्युम्न विद्यापति तथा मंत्रियों को लेकर सागरतट पर पहुंचे. स्वप्न के अनुसार एक बड़ा कुंदा पानी में बहकर आ रहा था. सभी उसे देखकर प्रसन्न हुए. दस नावों पर बैठकर राजा के सेवक उस कुंदे को खींचने पहुंचे.
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मोटी-मोटी रस्सियों से कुंदे को बांधकर खींचा जाने लगा लेकिन कुंदा टस से मस न हुआ. और लोग भेजे गए. सैकड़ों लोग और नावों का प्रयोग करके भी कुंदे को हिलाया तक नहीं जा सका.
राजा का मन उदास हो गया. सेनापति ने एक लंबी सेना कुंदे को खींचने के लिए भेज दी.
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HARI ANANT HARI KATHA ANANTA… JAI SHRI JAGNATH BHAGWAN.