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विद्यापति ने ललिता से कहा- तुमने मुझे कुल का पुरुष माना तो क्या मैं कुलदेवता का दर्शन नहीं कर सकता? मेरी बड़ी इच्छा है दर्शन की. तुम इसे पूरी करो.
ललिता बोली- यह संभव ही नहीं. हमारे कुलदेवता के बारे में किसी को जानने की इच्छा है, यह सुनकर मेरे पिता क्रोधित हो जाएंगे.
विद्यापति ने कहा- देवता के दर्शन से किसी को रोकना तो घोर पाप है. तुम्हारे पिता ऐसा पाप कैसे करेंगे? मैं धर्मनिष्ठ व्यक्ति हूं. धर्म का पालन करता हूं. इसलिए देवता के दर्शन का तो मेरा अधिकार है. मुझे इस अधिकार से न वंचित करो प्रिये.
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ललिता तर्क से सहमत थी पर एक बात ऐसी थी जिससे वह विवश थी. वह विद्यापति को यह बात स्वयं नहीं बताना चाहती थी. उसने एक निर्णय किया.
विद्यापति की उत्सुक्ता बढ़ रही थी. वह तरह-तरह से ललिता के अपने प्रेम की शपथ देकर उसे मनाने लगे. उसने पतिव्रत धर्म निभाने की शपथ दिलाई. ललिता से कहा कि जो स्त्री पति की इच्छा नहीं पूरी करती वह मोक्ष नहीं पाती. उसका पति भी प्रेत बनकर भटकता रहता है. उसके कुल का उद्धार नहीं होता.
ललिता ने हारकर कहा कि अपने पिताजी से विनती करेगी कि वह आपको दर्शन करा दें. ललिता ने पिता को सारी बात बताई तो वह क्रोधित हो गए.
ललिता ने विश्वावसु से कहा- मैं आपकी अकेली संतान हूं. आपके बाद देवता के पूजा का दायित्व मेरा होगा. इसलिए मेरे पति का यह अधिकार बनता है क्योंकि आगे उसे ही पूजना होगा. आप पुत्र और पुत्री में भेद नहीं कर सकते. जामाता को पुत्र समझें और उसे उसका अधिकार दें.
विश्वावसु इस तर्क के आगे झुक गए.
वह बोले- गुफा के दर्शन किसी को तभी कराए जा सकते हैं जब वह भगवान की पूजा का दायित्व अपने हाथ में ले ले. तुम भली-भांति जानती हो कि मैं विद्यापति को वहां क्यों नहीं जाने देना चाहता.
ललिता बोली- मैं जानती हूं पर विद्यापति अब कोई यात्री नहीं. वह हमारे परिवार का सदस्य हैं. वह यहीं के वासी हो चुके हैं. इसलिए उनके दर्शन करने से देवता का संकट नहीं आएगा. हमारे कुलदेवता लुप्त नहीं होंगे.
विद्यापति छुपकर पिता-पुत्री के बीच की बात सुन रहे थे. देवता लुप्त हो जाएंगे, यह सुनकर वह अपना कौतूहल रोक न सके. सामने आ गए देवता के लुप्त होने का क्या रहस्य है यह पूछा.
विश्वावसु ने जब जाना कि विद्यापति ने उसके देवता का रहस्य सुन लिया है तो उनका हृदय धक कर गया.
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विद्यापति ने अपने ससुर को विश्वास दिलाया कि वह दायित्व को पूरा करेगा. इसके लिए वह ईश्वर की सौगंध लेने को तैयार है तो विश्वावसु ने वह रहस्य बताना शुरू किया.
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HARI ANANT HARI KATHA ANANTA… JAI SHRI JAGNATH BHAGWAN.