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इंद्रद्य़ुम्न ने स्वप्न की बात पुनः पुरोहित और मंत्रियों को बताई. सभी यह निष्कर्ष पर पहुंचे कि प्रभु की कृपा सहज प्राप्त नहीं होगी. उसके लिए हमें निर्मल मन से परिश्रम आरंभ करना होगा.

भगवान का विग्रह कहां है, इसका पता लगाने की जिम्मेदारी इंद्रद्युमन ने चार विद्वान पंडितों को सौंप दिया. प्रभु इच्छा से प्रेरित चारों विद्वान चार दिशाओं में निकले. उन चारों में एक थे विद्यापति.

चारों विद्वानों में सबसे कम उम्र के थे विद्यापति. सभी प्रभु के विग्रह की खोज को चल पड़े. पंडित विद्यापति पूर्व दिशा की ओर चले. कुछ आगे चलने के बाद विद्यापति उत्तर की ओर मुडे़ तो उन्हें एक जंगल दिखाई दिया. वन भयावह था.

विद्यापति श्रीकृष्ण के उपासक थे. उन्होंने श्रीकृष्ण का स्मरण किया और राह दिखाने की प्रार्थना की. भगवान श्रीकृष्ण की प्रेरणा से उन्हें राह दिखने लगी. प्रभु का नाम लेते वह वन में चले जा रहे थे. जंगल के मध्य उन्हें एक पर्वत दिखाई दिया. पर्वत के वृक्षों से संगीत की ध्वनि सा सुरम्य गीत सुनाई पड़ रहा था.

विद्यापति संगीत के जानकार थे. उन्हें वहां मृदंग, बंसी और करताल की मिश्रित ध्वनि सुनाई दे रही थी. यह संगीत उन्हें दिव्य लगा. यह संगीत तो सामान्य मानवों द्वारा हो ही नहीं सकता. ये वाद्य या तो गंधर्व बजा रहे हैं या स्वयं देवता. संभवतः मैं सही जगह आ पहुंचा हूं. उस ऋषि ने बताया था कि भगवान के विग्रह की पूजा करने से पूर्व देवता गीत-संगीत से उन्हें प्रसन्न करते हैं.

विद्यापति को तो जैसे पंख लग गए. वह संगीत की लहरियों को खोजते विद्यापति आगे बढ़ चले. वह जल्दी ही पहाड़ी की चोटी पर पहुंच गए. पहाड़ के दूसरी ओर उन्हें एक सुंदर घाटी दिखी जहां भील नृत्य कर रहे थे.

विद्यापति उस दृश्य को देखकर मंत्रमुग्ध थे. सफर के कारण थके थे पर संगीत से थकान मिट गयी. उन्हें नींद आने लगी. तभी वहां एक बड़ी विचित्र बात हो गई.

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अचानक एक बाघ की गर्जना सुनकर विद्यापति घबरा उठे. बाघ उनकी और दौड़ता आ रहा था. बाघ को देखकर विद्यापति घबरा गए और बेहोश होकर वहीं गिर पडे.

बाघ विद्यापति पर आक्रमण करने ही वाला था कि तभी एक स्त्री ने बाघ को पुकारा. “बाघा! ओ बाघा! रूक जा!”

उस आवाज को सुनकर बाघ मौन खड़ा हो गया. स्त्री ने उसे लौटने का आदेश दिया तो बाघ लौट पड़ा. बाघ स्त्री के पैरों के पास ऐसे लोटने लगा जैसे कोई बिल्ली पुचकार सुनकर खेलने लगती है. युवती बाघ की पीठ को प्यार से थपथपाने लगी, बाघ स्नेह से लोटता रहा.

वह स्त्री वहां मौजूद स्त्रियों में सर्वाधिक सुंदर थी. वह भीलों के राजा विश्वावसु की इकलौती पुत्री थी-ललिता. ललिता ने अपनी सेविकाओं को अचेत विद्यापति की देखभाल के लिए भेजा. सेविकाओं ने झरने से जललेकर विद्यापति पर छिड़का.

कुछ देर बाद विद्यापति की चेतना लौटी. उन्हें जल पिलाया गया. विद्यापति यह सब देखकर कुछ आश्चर्य में थे.

ललिता विद्यापति के पास आई और पूछा- आप कौन हैं? भयानक जानवरों से भरे इस वन में आप कैसे पहुंचे? आपके आने का प्रयोजन बताइए ताकि मैं आपकी सहायता कर सकूं.

विद्यापति के मन से बाघ का भय पूरी तरह गया नहीं था. ललिता ने यह बात भांप ली. सांत्वना देते हुए बोली- विप्रवर आप मेरे साथ चलें. जब आप स्वस्थ हों तब अपने लक्ष्य की ओर प्रस्थान करें.

विद्यापति ललिता के पीछे-पीछे उनकी बस्ती की तरफ चल दिए. विद्यापति भीलों के पाजा विश्वावसु से मिले. विश्वावसु को उसने अपना पूरा परिचय नहीं दिया. बस यह कहा कि वह श्रीकृष्ण के भक्त हैं. वह भ्रमण करके लोगों को भगवान के विषय में ज्ञान देते हैं. उनकी शंका का समाधान करते हैं.

विद्यापति ने अपना वास्तविक परिचय तब तक छुपाना उचित समझा जब तक कि वह अपने लक्ष्य तक न पहुंच जाए.  विश्वावसु, विद्यापति जैसे विद्द्वान से मिलकर बड़े प्रसन्न हुए.

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