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भगवान नारद की चतुराई पर हंस पड़े. भगवान बोले- आपको इस दुर्लभ स्वरूप के पुनःदर्शन के लिए प्रतीक्षा तो करनी ही पड़ेगी देवर्षि. मालवराज इंद्रद्युुम्न समुद्र के उत्तर दिशा और महानदी के दक्षिणदिशा में श्रीक्षेत्र में भव्य मंदिर का निर्माण कराएंगे. वहां मेरी प्रतिमा धातु या पाषाण की न होकर स्वयं कल्पवृक्ष से होगी. वहां मेरा स्वरूप वही होगा जो आपने देखने की लालसा प्रकट की.

नारदजी का कौतूहल शांत हो गया. वह प्रसन्न होकर भगवान की स्तुति करके अपने लोक को चले गए. श्रीक्षेत्र यानी श्रीजगन्नाथपुरी क्षेत्र में इंद्रद्युम्न द्वारा भगवान जगन्नाथ मंदिर की स्थापना की कथा यहीं से आरभ होती है. भगवान नीलमाधव के इस पुरुषोत्तम क्षेत्र पर सुदूर मालव में राज करने वाले इंद्रद्युम्न कैसे पहुंचे. कैसे हुई मंदिर की स्थापना. क्यों कहा जाता है इसे पुरुषोत्तम क्षेत्र.

बहुत सरस कथा आती है राजर्षि राजा इंद्रद्युम्न की. विभोर करने वाली कथा स्कंदपुराण में भी आती है. कथा को आगे बढ़ाने से पहले मैं आपको श्रीक्षेत्र के बारे में बताउंगा. आखिर भगवान ने इसी क्षेत्र को क्यों चुना? इस क्षेत्र की इतनी महिमा क्यों है? यह कथा स्वयं लक्ष्मीजी ने बताई है.

इंद्रद्युम्न एक बार ऋषियों की सभा में पहुंचे. राजा ने ऋषियों विद्वानों से पूछा- सर्वश्रेष्ठ विद्वतजनों से भरी सभा में मैं एक जिज्ञासा रखना चाहता हूं. ऋषियों आपने समस्त तीर्थों का सेवन किया है. मुझे कोई ऐसा तीर्थ बताइए जिसके सेवन से बड़े-से-बड़ा पापी भी निष्कलंक हो जाता है. जिसके दर्शन से ंसंचित पुण्यों का नाश नहीं होता. जिस क्षेत्र में प्रवेशमात्र से ही हृदय में नारायण का वास हो जाता है. मेरी वहां जाने की लालसा है.

राजा के प्रश्न से उस सभा में शांति छा गई. कोई एकस्थान के बारे में ऐसा निर्णय नहीं कर पाया.

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एक वृद्ध संत उठ खड़े हुए और बोले- राजन आप श्रीक्षेत्र चाहिए. वहां भगवान नारायण का साक्षात वास है. स्वयं ब्रह्माजी और समस्त देवता प्रतिदिन नारायण के दर्शन को वहां आते हैं. वहां रोहिणी कुंड के पास एक कल्पवृक्ष है. उस सरोवर में भूल से भी स्नान कर लेने वाला भगवान श्रीकृष्ण का सायुज्य प्राप्त कर लेता है.

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राजा और वहां उपस्थिति सभी विद्वान यह सुनकर आश्चर्य में थे. संत ने कथा आगे बढ़ाई.

एक बार एक कौवे को जलक्रीड़ा की सूझी. वह मस्ती में डूबकर रोहिणी कुंड के पास पहुंचा और कुंड के जल में एक डुबकी लगाई. जल का स्पर्श करने के सात ही चमत्कार हुआ. नीच योनि वाला वह पशु तत्काल पवित्र हो गया. उसे श्रीकृष्ण का सायुज्य प्राप्त हो गया. वह श्रीकृष्ण के समान दिखने वाला और पवित्र हो गया.

हे परमनारायण भक्त इंद्रद्युम्न आप उस पुरुषोत्तम क्षेत्र में जाइए. वहां भगवान के नीलकंठ स्वरूप का दर्शन करें. वहां आपको एक साथ समस्त देवताओं के दर्शन हो जाएंगे. देवतागण अपने-अपने लोक से प्रतिदिन भगवान के लिए सुंदर पुष्प एवं भोग अर्पण करते हैं. आप उस दिव्यभूमि में अवश्य जाएं.

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