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राजा सहमत तो थे लेकिन उन्हें एक चिंता हुई. राजा बोले- यदि कोई आपके पास नहीं आएगा तो ऐसी हालत में आपके खाने पीने की व्यवस्था कैसे होगी?
शिल्पी ने कहा- जब तक मेरा काम पूर्ण नहीं होता मैं कुछ खाता-पीता नहीं हूं.
राजमंदिर के एक विशाल कक्ष में उस बूढ़े शिल्पी ने स्वयं को 21 दिनों के लिए बंद कर लिया. बाहर वादक वाद्ययंत्र बजाने लगे तो मूर्ति निर्माण कार्य आरंभ हुआ. भीतर से औजारों के चलने की आवाजें आती थीं.
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महारानी गुंडीचा देवी दरवाजे से कान लगाकर अक्सर छेनी-हथौड़े के चलने की आवाजें सुना करती थीं. महारानी रोज की तरह कमरे के दरवाजे से कान लगाए खड़ी थीं.
पंद्रह दिन बाद उन्हें कमरे से आवाज सुनायी पड़नी बंद हो गई. जब मूर्तिकार के काम करने की कोई आवाज न मिली तो रानी चिंतित हो गईं.
उन्हें लगा कि वृद्ध आदमी है, खाता-पीता भी नहीं कहीं उसके साथ कुछ अनिष्ट न हो गया हो. व्याकुल होकर रानी ने दरवाजे को धक्का देकर खोला और भीतर झांककर देखा.
महारानी गुंडीचा देवी ने इस तरह मूर्तिकार को दिया हुआ वचन भंग कर दिया था. मूर्तिकार अभी मूर्तियां बना रहा था परंतु रानी को देखते ही अदृश्य हो गए. मूर्ति निर्माण का कार्य अभी तक पूरा नहीं हुआ था. भगवान के हाथ-पैर अभी नहीं बन सके थे.
राजा और रानी दोनों विलाप करने लगे. उन्होंने अपना वचन भंग कर दिया था. ईश्वर ने उन्हें हृदय में प्रेरणा दी तुम व्यर्थ चिंतित हो रहे हो. जो शिल्पी आए थे वे स्वयं भगवान विश्वकर्मा थे.
जिन प्रतिमाओं को तुम अपूर्ण समझ रहे हो वास्तव में वैसी ही प्रतिमा स्थापित होनी थी. मैंने नारद को यह वरदान दिया था. नारद भी इतने समय से तुम्हारे बीच ही गोपनीय रूप में उपस्थित हैं. नारद तुम्हें दर्शन देकर सारा रहस्य बताएंगे. अब तुम ध्यान से वह विधि सुनो जिसे करके ही प्राण प्रतिष्ठा करना.
नीलांचल पर सौ कुएं बनवाओ. सौ यज्ञों का आयोजन करो. कुओं के जल से मेरा अभिषेक होगा. उसके बाद इसकी स्थापना स्वयं ब्रह्मदेव से करेंगे. वहां तुम्हें लेकर नारद जाएंगे.
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राजा ने नीलांचल पर्वत पर विशाल मंदिर का निर्माण कराया. ऐसा विशाल मंदिर उस समय भूलोक पर दूसरा न था. भगवान के बताए अनुसार नारदजी प्रकट हुए. भगवान की इच्छानुसार वह राजा इंद्रद्युम्न को लेकर ब्रह्मलोक की ओर चले.
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HARI ANANT HARI KATHA ANANTA… JAI SHRI JAGNATH BHAGWAN.