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विश्वावसु राजी हो गए. राजा सपरिवार विश्वावसु को लेकर सागरतट पर पहुंचे. विश्वावसु ने कुंदे को छुआ. छूते ही कुंदा अपने आप तैरता हुआ किनारे पर आ लगा. राजा के सेवकों ने उस कुंदे को राजमहल में पहुंचा दिया.
अगले दिन मूर्तिकारों और शिल्पियों को राजा ने बुलाकर मंत्रणा की कि आखिर इस कुंदे से कौन सी देवमूर्ति बनाना शुभदायक होगा. मूर्तिकारों ने कह दिया कि वे पत्थर की मूर्तियां बनाना तो जानते हैं लेकिन लकड़ी की मूर्ति बनाने का उन्हें ज्ञान नहीं.
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एक नए विघ्न के पैदा होने से राजा फिर चिंतित हो गए. राजा पुनः भगवान का स्मरण करने लगे. भगवान ने प्रेरणा दी कि तुम इसकी चिंता छोड़ो. तुम्हारे पास एक योग्य शिल्पी पधारेंगे. वही इस विग्रह का निर्माण कर सकते हैं. वे नियम के बड़े पक्के हैं. तुम उन्हें मान लेना और अपना वचन मत भंग करना.
अगले दिन एक वृद्ध व्यक्ति राजसभा में आया और बोला- मैं जानता हूं कि कौन सी प्रतिमा स्थापित की जानी चाहिए. मैं वह प्रतिमा भी बनाउंगा. आप भगवान श्रीकृष्ण को उनके भाई बलभद्र तथा बहन सुभद्रा के साथ यहां विराजमान करें. इस दैवयोग का यही संकेत है.
राजा को उस बूढ़े व्यक्ति की बात से सांत्वना मिली. उसे भगवान का स्वप्न याद आया. परखने के लिए राजा ने पूछा कि आखिर मूर्ति बनेगी कैसे?
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उस वृद्ध ने कहा- मैं इस कला में कुशल हूं. मैं इस पवित्र कार्य को पूरा करूंगा और मूर्तियां बनाउंगा. पर मेरी एक शर्त है. मैं भगवान की मूर्ति निर्माण का काम एकांत में करूंगा. मैं यह काम बंद कमरे में करुंगा. कार्य पूरा करने के बाद मैं स्वयं दरवाजा खोलकर बाहर आऊंगा.
इस बीच कोई मुझे न बुलाए, न मेरे पास आए. यदि किसी ने बीच में बाधा की तो मैं काम अधूरा छोड़कर लुप्त हो जाऊंगा. जब तक निर्माणकार्य चले बाहर संगीत बजना चाहिए ताकि मेरे कार्य की सूचना किसी को न लगे. मेरे औजारों के चलने की आवाज महल के बाहर न जाए इसकी व्यवस्था कर दें.
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HARI ANANT HARI KATHA ANANTA… JAI SHRI JAGNATH BHAGWAN.