नागपंचमी पूजा विधि और नागपंचमी की कथा: मिटेगा नागदंश का भय
नागपंचमी पूजा विधि और नागपंचमी की कथा: मिटेगा नागदंश का भय
नागपंचमी पूजा का महत्वः
नाग शिवजी के कंठाहार हैं और शिवपुराण में नागों के बारे में विस्तृत वर्णन है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को शिवजी के सेवकों यानी नागों की पूजा का विशेष दिन होता है, जिसे नागपंचमी के रूप में मनाया जाता है।
नागपंचमी पूजा से शिवजी अत्यंत प्रसन्न होते हैं। देश के बहुत से हिस्सों में कृष्णपक्ष की नागपंचमी मनाई जाती है, जबकि उत्तर भारत के बड़े क्षेत्रों में शुक्लपक्ष की नागपंचमी पर व्रत-पूजन आदि का विधान है।
मान्यता है कि जो भी व्यक्ति नागपंचमी के दिन नागों की पूजा करता है, उसे कभी सर्प या नागदंश का भय नहीं होता। नागपंचमी पर नाग दर्शन का विधान कहा गया है, किंतु यदि आप घर पर ही नाग प्रतिमाओं की पूजा कर लें, तो वह भी पर्याप्त है। आइए जानते हैं सही नागपंचमी पूजा विधि और महत्व।
नागपंचमी पूजा विधि
नागपंचमी पर सुबह नित्य कर्मों से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र पहन लें। किसी भी पूजा में प्रथम पूजा भगवान गणेशजी की होती है। इसलिए सबसे पहले गणपति का स्मरण करें। (गणपति के सरल आह्वान का मंत्र प्रभु शरणम् ऐप्प में है। यदि आप वह नहीं कर पा रहे तो एक माला ‘ऊँ गं गणपत्यै नमः’ की जप लें।)
गणेश पूजन के बाद भगवान भोलेनाथ का ध्यान करें। इसके बाद यदि आपके पास नाग-नागिन के जोड़े की प्रतिमा (सोने, चांदी या तांबे से निर्मित) है, तो उसे स्थापित करें। यदि प्रतिमा नहीं है, तो तस्वीर के सामने नीचे दिया गया मंत्र बोलें-
अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मानाभं च कम्बलम्। शंखपाल धार्तराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा।। एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम्। सायंकाले पठेन्नित्यं प्रात:काले विशेषत:।। तस्मै विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत्।।
पूजा का संकल्प लें। नाग-नागिन के जोड़े की प्रतिमा का दूध से स्नान करवाएं। यदि प्रतिमा नहीं है और सिर्फ तस्वीर है, तो एक कटोरे में इस भाव से दूध रखें कि आप नाग-नागिन का स्नान करा रहे हैं और दूध तस्वीर से स्पर्श करा दें।
इसके बाद शुद्ध जल से स्नान कराकर गंध, पुष्प, धूप, दीप से पूजन करें तथा सफेद मिठाई का भोग लगाएं। इसके बाद सभी स्थानों पर पाई जाने वाली सर्प जाति को प्रसन्न करने के लिए निम्न प्रार्थना करें-
सर्वे नागा: प्रीयन्तां मे ये केचित् पृथिवीतले।
ये च हेलिमरीचिस्था येन्तरे दिवि संस्थिता।।ये नदीषु महानागा ये सरस्वति गामिन:।
ये च वापी तडागेषु तेषु सर्वेषु वै नम:।।
सपने में सांप, खुश हो जाएंगे आप
नाग गायत्री मंत्र

नागपंचमी पूजा में सबसे प्रभावी नाग गायत्री मंत्र को माना जाता है। यदि समय के अभाव में ऊपर बताई गई विधियों का पालन नहीं हो पा रहा है, तो नीचे लिखे मंत्र का कम से कम नौ बार जप करें। नागपंचमी को नौ विशेष नागों की पूजा बताई जाती है-
ऊँ नागकुलाय विद्महे विषदन्ताय धीमहि तन्नो सर्प: प्रचोदयात्।
सर्पसूक्त का पाठ
वैसे तो इतनी पूजा भी पर्याप्त है, किंतु बहुत से लोगों के नाग कुलदेवता होते हैं। वे विधिवत पूजा के लिए मंदिरों में भी जाते हैं। उन्हें किसी नागमंदिर में या शिव मंदिर में सर्पसूक्त का पाठ अवश्य कर लेना चाहिएः
ब्रह्मलोकेषु ये सर्पा: शेषनाग पुरोगमा:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
इन्द्रलोकेषु ये सर्पा: वासुकि प्रमुखादय:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
कद्रवेयाश्च ये सर्पा: मातृभक्ति परायणा।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
इंद्रलोकेषु ये सर्पा: तक्षका प्रमुखादय:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
सत्यलोकेषु ये सर्पा: वासुकिना च रक्षिता।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
मलये चैव ये सर्पा: कर्कोटक प्रमुखादय:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
पृथिव्यांचैव ये सर्पा: ये साकेत वासिता।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
सर्वग्रामेषु ये सर्पा: वसंतिषु संच्छिता।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
ग्रामे वा यदिवारण्ये ये सर्पा प्रचरन्ति च।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
समुद्रतीरे ये सर्पा ये सर्पा जलवासिन:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
रसातलेषु या सर्पा: अनन्तादि महाबला:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
इसके बाद नागदेवता की आरती करें और प्रसाद वितरित कर दें। इससे नागदेवता प्रसन्न होते हैं और आपके संकटों का समाधान करते हैं।
यदि आप नागपंचमी का व्रत नहीं कर पा रहे हैं, तो भी नागप्रतिमा या शिवप्रतिमा के समक्ष बैठकर नागपंचमी की कथा अवश्य पढ़नी या सुननी चाहिए।
नागपंचमी की कथा
एक सेठजी के सात पुत्र थे। सातों का विवाह हो चुका था। सबसे छोटे पुत्र की पत्नी श्रेष्ठ चरित्र की विदुषी और सुशील थी, परंतु उसका कोई भाई नहीं था।
एक दिन बड़ी बहू ने घर लीपने के लिए पीली मिट्टी लाने को सभी बहुओं से साथ चलने को कहा। सभी डलिया और खुरपी लेकर मिट्टी खोदने लगीं। तभी वहां एक सर्प निकला, जिसे बड़ी बहू खुरपी से मारने लगी। यह देखकर छोटी बहू ने उसे रोकते हुए कहा- “मत मारो इसे, यह बेचारा निरपराध है।” यह सुनकर बड़ी बहू ने उसे नहीं मारा और सर्प एक ओर जा बैठा।
तब छोटी बहू ने उस सर्प से कहा- “हम अभी लौट कर आते हैं तुम यहां से जाना मत।” यह कहकर वह सबके साथ मिट्टी लेकर घर चली गई और वहां कामकाज में फंसकर सर्प से किया वादा भूल गई।
उसे दूसरे दिन वह बात याद आई तो सब को साथ लेकर वहां पहुंची। सर्प को उसी स्थान पर बैठा देखकर वह बोली- “सर्प भैया नमस्कार!” सर्प ने कहा- “तू मुझे भैया कह चुकी है, इसलिए तुझे छोड़ देता हूं, नहीं तो झूठी बात कहने के कारण तुझे अभी डस लेता।” वह बोली- “भैया मुझसे भूल हो गई, क्षमा मांगती हूं।”
तब सर्प बोला- “अच्छा, तू आज से मेरी बहिन हुई और मैं तेरा भाई हुआ। तुझे जो मांगना हो, मांग ले।” वह बोली- “भैया! मेरा कोई नहीं है, अच्छा हुआ जो तू मेरा भाई बन गया।”
कुछ दिन व्यतीत होने पर वह सर्प मनुष्य का रूप रखकर उसके घर आया और बोला- “मेरी बहिन को भेज दो।” सबने कहा कि इसके तो कोई भाई नहीं है। तो वह बोला- “मैं दूर के रिश्ते में इसका भाई हूं, बचपन में ही बाहर चला गया था।”
उसके विश्वास दिलाने पर घर के लोगों ने छोटी बहू को उसके साथ भेज दिया। उसने मार्ग में बताया- “मैं वहीं सर्प हूं, इसलिए तू डरना नहीं और जहां चलने में कठिनाई हो वहां मेरी पूछ पकड़ लेना।”
उसने कहे अनुसार ही किया और इस प्रकार वह उसके घर पहुंच गई। वहां के धन-ऐश्वर्य को देखकर वह चकित हो गई। एक दिन सर्प की माता ने उससे कहा- “मैं काम से बाहर जा रही हूं। तू अपने भाई को ठंडा दूध पिला देना।” उसे यह बात ध्यान न रही और उसने गर्म दूध पिला दिया जिससे सर्प का मुख बेतरह जल गया। यह देखकर सर्प की माता बहुत क्रोधित हुई परंतु सर्प के समझाने पर चुप हो गई। तब सर्प ने कहा कि बहिन को अब उसके घर भेज देना चाहिए।
तब सर्प और उसके पिता ने उसे बहुत सा सोना, चाँदी, जवाहरात, वस्त्र-भूषण आदि देकर उसके घर पहुंचा दिया। इतना धन देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्या से कहा- “तेरा भाई तो बड़ा धनवान है। तुझे तो उससे और भी धन लाना चाहिए।”
सर्प ने यह वचन सुना तो और सब वस्तुएं सोने की लाकर दे दीं। यह देखकर बड़ी बहू ने कहा- “सोने की चीजों को झाड़ने की झाड़ू भी तो सोने की ही होनी चाहिए।” तब सर्प ने झाड़ू भी सोने की लाकर रख दी।
सर्प ने छोटी बहू को हीरे-मणियों का एक अद्भुत हार दिया था। उस हार की प्रशंसा उस देश की रानी ने भी सुनी और वह राजा से बोली कि- “सेठ की छोटी बहू का हार यहां मेरे पास आना चाहिए।” राजा के मंत्री ने सेठजी से जाकर हार मांग लिया।
छोटी बहू को यह बात बहुत बुरी लगी। उसने अपने सर्प भाई को याद किया और प्रार्थना की- “भैया! रानी ने हार छीन लिया है। तुम कुछ ऐसा करो कि जब वह हार उसके गले में रहे तब तक के लिए सर्प बन जाए और जब वह डरकर हार मुझे लौटा दे तब वह वापस हीरों और मणियों का हो जाए।”
सर्प ने ठीक वैसा ही किया। जैसे ही रानी ने हार पहना, वह सर्प बन गया। रानी चीख पड़ी। यह देखकर राजा ने सेठ को बुलवाया और छोटी बहू को हार वापस कर दिया। छोटी बहू ने जैसे ही उसे पहना, वह वापस हीरे-मणियों का हो गया। राजा ने प्रसन्न होकर उसे बहुत सी मुद्राएं भी पुरस्कार में दीं।
उसके धन को देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्या के कारण उसके पति को सिखाया कि छोटी बहू के पास कहीं से धन आया है। पति के पूछने पर छोटी बहू ने सर्प को याद किया। सर्प ने प्रकट होकर कहा- “यदि मेरी धर्म बहिन के आचरण पर संदेह प्रकट करेगा तो मैं उसे खा लूंगा।” यह सुनकर छोटी बहू का पति बहुत प्रसन्न हुआ और उसने सर्प देवता का बड़ा सत्कार किया।
उसी दिन से नागपंचमी का त्योहार मनाया जाता है और स्त्रियां सर्प को भाई मानकर उसकी पूजा करती हैं तथा भाई से अपने कुटुंबजनों की रक्षा का आशीर्वाद मांगती हैं।
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