मौन का शास्त्रों में बड़ा महत्व कहा गया है. संन्यास के लिए मौन धारण करने का अभ्यास अनिवार्य बताया गया है. इसे धर्म से जोड़ने के लिए मौनी अमावस्या तक होती है. मौन क्या है, इसकी अहमियत क्या है. सुंदर कथा जिससे सीखना चाहिए.
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मौन साधनापथ है जो आपको भीतर से मांजकर चमकाती है जैसे कोई बर्तन मांजता है. जो नियम से मौन का अभ्यास करने लगते हैं वे धीरे-धीरे ध्यान की स्थिति में जाने लगते हैं. ध्यान की स्थिति यदि सहजता से लगने लगे तो फिर ईश्वर की अनुभूति अवश्य होने लगती है. हर धर्मनिष्ठ की यही तो कामना होती है कि उसे ईश्वर की अनुभूति हो. यानी मौन ईश्वर की अनुभूति के मार्ग का पहला दरवाजा है जिसे आपको खोलना होगा.
मौन पर चर्चा करेंगे पहले एक छोटी सी प्रेरक कथा सुनाता हूं. एक अनुरोध है यदि आपको पोस्ट पसंद आए और आप फेसबुक के माध्यम से इस पोस्ट तक पहुंचे हैं. तो कृपया उस पोस्ट को शेयर कर दीजिएगा ताकि अन्य लोगों तक भी जाए. यदि अन्य माध्यम से पहुंचे हैं तो भी इसे फेसबुक पर शेयर बटन दबाकर शेयर कर दीजिएगा. अब मौन की कथा आरंभ करते हैं.
एक संत अपने शिष्य के साथ जंगल में जा रहे थे. ढलान पर से गुजरते अचानक शिष्य का पैर फिसला. शिष्य तेजी से नीचे की ओर लुढ़कने लगा. वह तो बस खाई में गिरने ही वाला था. मौत स्पष्ट नजर आ रही थी कि तभी उसके हाथ में बांस का एक पौधा आ गया. उसने लपककर बांस के पौधे को मजबूती से पकड़ लिया. इस तरह वह खाई में गिरने से बच गया.
उसकी जान बचाने के लिए वह धनुष की तरह मुड़ गया. न तो वह जमीन से उखड़ा और न ही टूटा. वह बांस को मजबूती से पकड़कर लटका रहा और सहायता की प्रतीक्षा करता रहा. कुछ ही पलों में उसके गुरू शिष्यों संग भागकर सहायता को पहुंचे.
उन्होंने हाथ का सहारा देकर शिष्य को ऊपर खींच लिया. इस तरह उसकी जान बच गई थी.
संत की संगति में रहता था, इसलिए कृतज्ञता का भाव था उसमें. जिसने जान बचाई थी उसका धन्यवाद करना ही चाहिए. उसने बांस के पौधे का हृदय से धन्यवाद किया. वह सोच रहा था कि बांस कितना परोपकारी है. गुरू के साथ वह आगे बढ़ चला. उसके मन में जो भाव चल रहे थे गुरू उसे सब पढ़ रहे थे.
कुछ देर बात संत ने शिष्य से पूछा- पुत्र तुमने उस बांस का आभार किया यह बहुत अच्छी बात है. कृतज्ञ होना ही चाहिए. पर जब तुम उससे लटके थे तब जान बचाने वाले बांस ने तुमसे कुछ कहा भी था. तुमने उसे सुना क्या?
जान बचाने वाला बांस कुछ कह रहा था! मैं कितना मूर्ख हूं कि उसकी बात सुनी ही नहीं पर मैं सुनता कैसे. एक तो मेरे प्राण संकट में थे. दूसरा मुझे पेड़-पौधों की भाषा नहीं आती. पर शायद गुरूदेव ने सुना है.
शिष्य ने कहा- नहीं गुरुजी, शायद प्राण संकट में थे इसलिए मैंने ध्यान नहीं दिया और मुझे तो पेड़-पौधों की भाषा भी नहीं आती. आप ही बता दीजिए उसका संदेश.
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