April 29, 2026

भागवत कथाः श्रीकृष्ण द्वारा पिता नंदबाबा को वरूण लोक से मुक्त कराना

कालिया मर्दक भगवान श्री कृष्ण मंत्र जप

कन्हैया के साथ तरह-तरह के अपशकुन हो रहे थे लेकिन कन्हैया बार-बार दुष्टों को दंड देकर आ जाते. नंदबाबा का हृदय तो पिता का था. उन्हें लगा कि अपने पुत्र को संकटों से बचाने के लिए एकादशी का व्रत रखने का निर्णय किया.

कार्तिक शुक्ल एकादशी को नंदबाबा ने व्रत रखा.भगवान की पूजा की लेकिन संयोग से द्वादशी रात में लगी. नंदबाबा रात को ही स्नान करने यमुना तट पर गए और नदी में प्रवेश किया.

नंदबबा को यह ज्ञात नहीं था कि यह असुरों की बेला है. वरूण के सेवक एक असुर ने नंदबाबा को जल में प्रवेश करते ही पकड़ लिया और अपने स्वामी के पास लेकर गया.

नंदबाबा के गायब हो जाने से सारे गोप-गोपी भयभीत हो गए. चीख-पुकार मच गई. श्रीकृष्ण को सूचना मिली. उन्होंने जब सुना कि नंदबाबा रात्रि पहर में स्नान के लिए जाते समय गायब हुए हैं तो वह सारी बात समझ गए.

श्रीकृष्ण ने यमुना में प्रवेश किया और सीधे वरूणजी के पास पहुंचे. जब लोकपाल वरूण ने सुना कि स्वयं श्रीकृष्ण पधारे हैं तो वह दौड़े-दौड़े आए. उन्होंने प्रभु की विभिन्न श्लोकों से स्तुति की.

वरूण बोले- प्रभो जब से मैंने लोकपाल का पद संभाला है तबसे इस आस में था. आज मैं धन्य हो गया जो आप स्वयं मेरे लोक में पधारे. आपके चरणों की सेवा करके मैं पूर्ण हो गया.

श्रीकृष्ण ने वरूण को फटकारा कि चाटुकारिता मत करो. तुमने मेरे पिता के हरण का प्रयास किया है इसके लिए तुम्हें कठोर दंड दूंगा. वरूण भयभीत होकर कांपने लगे.

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कांपते स्वरों में वरूण बोले- मेरा सेवक मूढ़ और अज्ञानी है. अज्ञानतावश वह आपके पिताजी को लेकर आया. अपराध क्षमा करें प्रभु. आप मुझ दास पर कृपा करें और क्रोध त्याग दें.

लोकपाल वरूण की स्तुति से प्रभु प्रसन्न हो गए. उन्होंने वरूण को क्षमा कर दिया और अपने पिता को लेकर चले. वरूण स्वयं उनकी स्तुति गाते हुए यमुना के तल तक आए.

नंदबाबा ने जिस प्रकार से वरूण को अनके पुत्र कन्हैया की स्तुति करते देखा तो उन्हें बड़ा विस्मय हुआ था. उन्होंने सभी व्रजवासियों को सारा हाल कह सुनाया. सबने समझ लिया कि श्रीकृष्ण साधारण बालक नहीं स्वयं भगवान का अवतार हैं.

सभी गोपों में इच्छा हुई कि प्रभु हमें अपने धाम के दर्शन कराते. क्या प्रभु कभी हम पर इतने कृपालु होंगे कि हम उनके धाम के एक बार दर्शन कर पाएं जहां बड़े-बड़े तपस्वी जाते हैं. प्रभु सबके मन के भाव पढ़ते मुस्करा रहे थे.

उन्होंने तत्काल माया रची और समस्त व्रजवासियों को उस ब्रह्मलोक का अंतःकरण में दर्शन करा दिया जिसके लिए ऋषि-मुनि तरसते हैं. जिनके बीच स्वयं भगवान सशरीर वास करते हों उनके लिए क्या असंभव!

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-राजन प्रकाश

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