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मोक्ष मिलता कैसे है- व्रत से, दान से या तप सेः लोमश ऋषि ने इंद्रद्युम्न को बताई सही राह

मोक्ष मिलता कैसे है- व्रत से, दान से या तप सेः लोमश ऋषि ने इंद्रद्युम्न को बताई सही राह

Kanha Krishna Kanhaiya

श्रीकृष्ण के सभी स्वरूप कल्याणकारी हैं. उनके चमत्कारिक स्वरूपों के दुर्लभ मन्त्रों, भागवत महापुराण व अन्य पुराणों में वर्णित कृष्ण लीलाएं, संपूर्ण गीता ज्ञान के लिए डाउनलोड करें “कृष्ण लीला” एंड्राइड एप्प.

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Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंएक राजा थे, नाम था इद्रद्युम्न. बड़े धार्मिक, बहुत बड़े दानी. कभी हजार सोने के सिक्कों से कम तो किसी को दिया ही नहीं. एकादशी के दिन पूरा राज्य ही व्रत रहता.

कहते हैं गंगा की रेतकण, वर्षा की बूंदें और आकाश के तारे गिने जा सकते हैं पर राजा इंद्रद्युम्न के पुण्य नहीं. इन्हीं दान पुण्य के प्रताप से वह सशरीर स्वर्ग चले गये और सौ कल्प वहां रहे.

एक दिन ब्रह्मा ने कहा- स्वर्ग में हमेशा के लिए रहने के लिए केवल पुण्य नहीं निष्कलंक यश भी चाहिए. आपका जो भी यश था वह इतने दिनों में क्षीण हो चुका है. अब आप स्वर्ग के अधिकारी होने लायक नहीं.

उचित यही है कि फिर धरती पर जाइए. अपने पुराने यश को फिर से स्थापित कीजिये, उसे चमकाइये. तब पुनः आइये. ब्रह्मा के यह कहने की देर थी कि राजा इंद्रद्युम्न ने अपने को धरती पर पाया.

राजा इंद्रद्युम्न अपने मूल नगर कांपिल्य में गये और बड़े बूढों से पूछा- बाबा इंद्रद्युमन नाम के राजा की याद है आपको? सबने कहा यह कौन था, हमें नहीं पता. किसी को इंद्रद्युम्न का नाम तक याद नहीं था.

एक बुजुर्ग ने कहा- आप मार्कंडेय मुनि के पास जाकर पूछिए. वह बहुत साल के हैं. सबसे बुजुर्ग हैं बता देंगें. राजा सात कल्पों तक जीवित रहने वाले मार्कंडेय मुनि के पास पहुंचे और अपना सवाल दोहराया.मार्कंडेयजी बोले- भाई मैं तो नहीं जानता पर मेरा एक मित्र है जो मुझसे बड़ा है. उसका नाम है- नाड़ीजंघ. एक बगुला है वह. उससे पूछकर देखते हैं. मार्कंडेय और इंद्रद्युमन दोनों नाड़ीजंघ बगुले के पास पहुंचे.

नाड़ीजंघ नामक यह बक तो बहुत बड़ा बक्की निकला उसने पहले तो अपनी एक लंबी कथा सुनायी फिर बोला कि मुझे भी नहीं पता. आप प्रकारकर्मा उलूक के पास जाओ. वह मुझसे भी बड़ा है. दूर-दूर तक की खबर रखता है.

सब प्रकारकर्मा उलूक के पास पहुंचे. बहुत बुढा चुके उस उलूक ने कहा- मेरी याददाश्त कमजोर हो चुकी है. विश्वास से कुछ नहीं कह सकता पर यह बात यकीन से कह सकता हूं कि अगर ऐसा कोई राजा हुआ है तो चिरायु गीधराज को पता होगी.

उलूक की बात सुनकर सब चिरायु गीध के पास पहुंचे. उसने भी नकार दिया कि इस नाम का कोई रजा उसकी जानकारी में था. हां मंथर नाम के कछुए को पुराने समय का सब विवरण याद है. आप उससे पूछें.

अब इंद्रद्युमन और मार्कंडे मुनि के साथ साथ नाड़ीजंघ बगुला, प्रकारकर्मा उलूक, चिरायु गीध सब मानसरोवर में रहने वाले कछुये मंथर के पास पहुंचे. सवाल पूछा गया. कछुए ने कहा- आप लोगों में से ये पांचवें राजा इंद्रद्युन ही तो हैं.मंथर ने कहा मुझे आपसे बहुत डर लगता है. एक बार आपने इतने यज्ञ कराये थे कि धरती गरम हो गयी और मेरी पीठ जल गयी थी. पर मुझे आपका वह उपकार भी याद है जो आपने निरवत क्षेत्र में कच्चा सरोवर बनाकर किया था.

राजा इंड्रद्युन को उस क्षेत्र में किसी तरह का सरोवर बनवाने की याद नहीं थी. असल में राजा ने एक बार इतनी गौएं दान में दीं कि उनके खुरों के उठापटक से एक बहुत बड़ा गड्ढा बन गया और दान के बाद हुई वर्षा ने उसे लबालब भर दिया.

कछुए ने कहा- आपके इस सत्कार्य का लाभ तमाम पशु, पक्षियों समेत, मछलियों, सर्पों, बगुलों, कछुओं समेत सैकडों दूसरे जीव जंतुओं ने उठाया. कछुए की निशानदेही पर राजा इंद्रद्युम्न के सत्कार्य और यश का सबूत मिल गया आउर वह स्थपित भी हो गए.

पर इतने से यश के साथ स्वर्ग जाकर इंद्रद्युम्न कब तक वहां रह पाते. इसलिये उन्होंने सीधे मोक्ष पाने का मार्ग तलाशने की सोची. मंथर ने कहा- सबलोग बहुत काल से धरती पर तप में रत लोमश ऋषि के पास चलें वही इसका रास्ता बतायेंगे.

मंथर सबको लेकर रास्ता बताते हुए लोमश ऋषि के पास पहुंचा. लोमश ऋषि कभी किसी कुटिया में न रहते बल्कि हमेशा अपनी मुट्ठी में दबाकर रखे कुछ तिनके अपने ऊपर डाल लेते.मंथर नें लोमशजी के पास जा कर कहा- ऋषिवर, राजा इंद्रद्युम्न कुछ पूछ्ना चाहते हैं. लोमशजी की अनुमति पाकर इंद्रद्युम्न बोले-पहली जिज्ञासा तो यही है मुनिवर की आप अपने निवास के लिए कुटिया क्यों नहीं बनाते?

लोमश मुनि बोले- यह शरीर निश्चित ही नष्ट हो जाना है, ऐसे में घर, निवास क्यों? यौवन, धन तथा जीवन सब नष्ट हो जाना है इसलिए दान ही सर्वश्रेष्ठ है.

राजा ने दूसरा प्रश्न किया- आपको यह लंबी उम्र तप से मिली है या दान के प्रभाव से. लोमश ऋषि ने कहा- राजन पिछले जन्म में मैं एक दरिद्र शूद्र था. एक दोपहर मैं कई दिन से भूखा था कि एक सरोवर में विशाल शिवलिंग देखा.

पास से खूब बड़े-बड़े सुंदर कमल के फूल तोड़े और भगवान शंकर को चढा दिए फिर आगे चल पड़ा. थोड़ी ही दूर जाने पर भूख से मेरी मौत हो गयी. अगले जन्म में मैं शिव पूजा के प्रभाव से ब्राह्मण के घर पैदा हुआ.

मुझे पिछली जन्म की सारी बातें याद थी इसलिये हमेशा चुप रहता और शिव की पूजा में लगा रहता. माता पिता के मरने के बाद सगे संबंधियों ने मुझे गूंगा और बेकार का पुजारी समझ त्याग दिया तो मैं और भी लगन से भगवान शिव की आराधना में डूब गया.

इस तरह सौ साल बीत गये तो भगवान शिव मुझपर प्रसन्न हुए और उन्होंने मुझे प्रत्यक्ष दर्शन दे लंबी आयु का वरदान दिया. यह सुनकर राजा इंद्रद्युम्न, चिरायु गीध, प्रकारकर्मा उलूक, नाड़ीजंघ बगुला और मंथर कछुए ने भी लोमशजी से शिवदीक्षा ली और तप करके मोक्ष को प्राप्त किया.

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