समय से पूर्व पके फल में न तो स्वाद होता है, न स्वास्थ्यः एक प्रेरक कथा
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आचार्य द्रोण से पांडव और कौरव दोनों ही शस्त्र और शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त कर रहे थे. अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनने की बड़ी लालसा थी. द्रोणाचार्य को परशुराम ने शब्दबेधी बाण चलाने की कला सिखाई थी.
शब्दबेधी बाण को आंख पर पट्टी बांधकर या बिना लक्ष्य को देखे सिर्फ उसकी ध्वनि सुनकर साधा जा सकता है. अर्जुन गुरुदेव स रोज शब्दबेधी बाण चलाना सिखाने का हठ करते, और द्रोण यह कहकर टालते कि अभी तुम्हारी तैयारी नहीं है.
अर्जुन का हठ बढ़ता जाता था. हारकर द्रोण ने अर्जुन को शब्दबेधी बाण सिखाने का तय किया. उससे पहले उन्होंने अर्जुन की परीक्षा ली. अर्जुन जब रात्रि भोजन कर रहे थे तो गुरू ने दीपक बुझा दिए.
अर्जुन ने अंधेरे में भी बिना एक दाना जमीन पर गिराए भोजन किया. भोजन के बाद द्रोण ने अर्जुन से पूछा- तुम्हें भोजन में परेशानी तो नहीं हुई?हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.अर्जुन ने कहा- गुरुदेव पेट को भोजन की प्रतीक्षा थी. हाथों को मुख का रास्ता अच्छे से पता है. फिर प्रकाश हो या न हो, उससे क्या फर्क पड़ता है. भोजन को उसके लक्ष्य तक पहुंचाना ही है.
द्रोण ने कहा- यही शब्दबेधी बाण का मर्म है. लक्ष्य को देखकर उस पर तो कोई भी निशाना साध सकता है, असली धनुर्धर तो वह है जो लक्ष्य की कल्पना कर ले, संकेतों से उसकी आकृति मन में बना ले. वही शब्दबेधी बाण चला सकता है.
जो परिपक्व नहीं वह लक्ष्य की सही कल्पना में चूक करता है. चूक से चलाया गया बाण कभी लक्ष्य नहीं बेधता. लक्ष्य की सही पहचान आवश्यक है.
अर्जुन गुरुदेव का तात्पर्य समझ गए. सबसे पहले उन्होंने रात्रि में बाण चलाने का अभ्यास आरंभ किया. कई महीनों तक के सधे हुए प्रयास से अर्जुन ने अंधेरे में भी लक्ष्य को बेधने में सफलता पा ली, फिर गुरु ने उन्हें शब्दबेधी बाण चलाना सिखा दिया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.यह कथा बहुत कुछ कहती है. हम जीवन में कई ऐसे कदम उठाते हैं जो हमारे लिए एकदम नए हैं और जरूरी भी हैं. एक कहावत है- जो जोखिम उठाते हैं, वहीं सफलता पाते हैं.
जोखिम उठाना गलत नहीं है लेकिन उसकी तैयारी कर लेने में कोई हर्ज नहीं. यदि अर्जुन ने पहले अंधेरे में बाण चलाने की कला न सीखी होती तो शायद वह शब्दबेधी बाण चलाना सीख ही नहीं पाते या सीखने में अवश्यकता से अधिक समय और परिश्रम लग जाता.
हम सबमें क्षमता होती है, जरूरत है अपनी क्षमता को पहचानकर धैर्य के साथ कार्य करने की. समय से पहले पके फल में न तो स्वाद होता है न ही स्वास्थ्य
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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