ययाति की कहानी: शुक्राचार्य ने दिया बुढ़ापा का शाप, राजा को मिला यौवनदान
ययाति की कहानीः शुक्राचार्य ने दिया बुढ़ापा का शाप, राजा को पुत्र से दान में मिला यौवन
महाभारत में ययाति की कहानी केवल एक राजा की कथा नहीं, बल्कि मनुष्य की इच्छाओं, वचन, शाप और वैराग्य का गहरा प्रतीक है। चंद्रवंश के प्रतापी राजा ययाति का जीवन हमें दिखाता है कि कैसे एक क्षण का आकर्षण और वचनभंग वर्षों की तपस्या और सुख‑समृद्धि को बदल देता है।

ययाति की कथा का इससे पहले का हिस्सा आप इस लिंक से पढ़ सकते हैंः
भागवत कथाः ययाति का देवयानी से विवाह
देवयानी, शर्मिष्ठा और वचनभंग
देवयानी ने शुक्राचार्य को ययाति और शर्मिष्ठा के गुप्त प्रेम और संतान उत्पत्ति की सारी बात कह सुनाई। ययाति ने शुक्राचार्य को वचन दिया था कि शर्मिष्ठा को वह कभी अपने जीवन में स्थान नहीं देंगे।
ययाति ने अपना वचन तोड़ दिया। इस बात से शुक्राचार्य बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने ययाति को शाप दिया –“ ययाति तुम्हारे ऊपर वासना और कामेच्छा इतनी अधिक प्रभावी है कि तुममें सही-गलत का निर्णय करनी की क्षमता खो दी है। तुमने आसक्ति में पड़कर वचनभंग किया है। काम की इच्छा से पीड़ित होकर तुम आगे भी अपराध करते रहोगे। इसलिए मैं तुम्हें शाप देता हूँ कि तुम तत्काल बूढ़े हो जाओगे। तुम्हारी शक्ति क्षीण हो जाए और तुम प्रेमक्रीड़ा में असमर्थ हो जाओ।”
ययाति की व्यथा और शुक्राचार्य से प्रार्थना

देवयानी पिता के पास पहुँची और अपनी व्यथा सुनाई। शुक्राचार्य को भी अपनी भूल का आभास हुआ कि उन्होंने क्रोध में तो अपनी बेटी का जीवन ही खराब कर दिया है।
ययाति ने शुक्राचार्य से कहा –“आपने यह शाप देकर अपनी पुत्री के जीवन को भी शापित कर दिया है, क्योंकि विवाहिता गृहस्थ के आमोद‑प्रमोद की उसकी बहुत सी आकांक्षाएँ अभी अपूर्ण हैं।”
देवयानी और ययाति दोनों ने शुक्राचार्य से शापमुक्ति की राह निकालने को कहा। तब शुक्राचार्य ने एक समाधान बताया, जो ययाति की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ बनता है।
उन्होंने कहा –“यदि ययाति का कोई पुत्र उनके जरा के बदले अपना यौवन दान कर दे, खुद बुढ़ापा भोगने को तैयार हो, तो शाप की स्थिति बदली जा सकती है।”
पुत्रों से यौवन माँगने की शर्त
महल पहुँचकर वृद्ध ययाति ने अपने ज्येष्ठ पुत्र यदु को बुलाया और कहा – पुत्र यदु तुम मुझे अपना यौवन दे दो, क्योंकि मैं मन से वह सब करना चाहता हूँ जो एक नवयुवक करना चाहता है। सहस्त्र वर्ष के बाद मैं तुम्हारा यौवन लौटा दूँगा।”
तुर्वसु को शाप देकर ययाति ने शर्मिष्ठा के पुत्र द्रुह्यु से भी युवावस्था की भीख माँगी, पर द्रुह्यु ने भी मना कर दिया। ययाति ने शाप दिया – द्रुह्यु, तुम ऐसे देश के राजा बनोगे जहाँ हाथी, घोड़े या रथ का मार्ग नहीं होगा। एकमात्र वाहन नाव रहेगा।”
इसके बाद ययाति ने अनु से याचना की। अनु ने भी मना कर दिया। ययाति ने उसे शाप दिया – तुम्हें शीघ्र जरावस्था का सामना करना पड़ेगा। तुम्हारे पुत्र अपने पूर्ण यौवन में काल‑कवलित होंगे और तुम इतने दुर्बल रहोगे कि यज्ञ आदि भी नहीं कर सकोगे।”
ययाति की कहानी का यह हिस्सा मनुष्य के स्वार्थ, भय और दृष्टिकोण को बहुत स्पष्ट करता है – हर पुत्र के निर्णय के पीछे उसकी अपनी सोच थी, और हर इनकार के साथ ययाति के मुख से एक नया शाप निकला।
पुरु की पितृभक्ति और ययाति को मिला यौवन

जब सभी बड़े पुत्रों ने अपना यौवन देने से मना कर दिया, तब ययाति ने अब सबसे छोटे बेटे पुरु से उसका यौवन माँगा। पिता को भोग-विलास की इच्छा में इतना तड़पते देखा पुरु का हृदय बड़ा दुखी हुआ। उससे ययाति का कष्ट न देखा गया और उसने पिता के लिए अपनी इच्छाओं के त्याग का निर्णय किया।
पुरु ने ययाति से कहा कि वह पिता की प्रसन्नता के लिए अपनी जवानी दान करने को राजी है। पुत्र से यौवनदान की बात सुनकर ययाति बड़ा खुश हुआ।
उसने पुरु को वरदान दिया – “तुम्हारे राज्य में प्रजा की सारी मनोकामनाएँ सिद्ध होंगीं। मेरे बाद तुम ही राजा बनोगे।”
इसके बाद ययाति शुक्राचार्य के पास गया और उन्हें सारी बात कह सुनाई। शुक्राचार्य ने ययाति की जरावस्था लेकर पुरु को दे दी। इसके साथ ही पुरु युवावस्था से विहीन हो गया। उसके बाल तत्काल सफेद हो गए। उसका शारीरिक सौष्ठव बूढे जैसा हो गया। कमर झुक गई और वह एक थका हुआ बुजुर्ग बन गया।
काम की इच्छा में अँधे ययाति को एक हजार वर्षों के लिए यौवनदान मिल गया था।
पुरु की पितृभक्ति और त्याग इस कथा का सबसे उज्ज्वल पक्ष है – वह अपने पिता के लिए स्वयं बुढ़ापा स्वीकार करता है और अपना यौवन दान में दे देता है।
पुनः यौवन, भोग‑विलास और धर्म‑कर्म
पुनर्यौवन पाकर ययाति फिर से भोग‑विलास में डूब गए। भोग‑विलास के साथ‑साथ ययाति धर्म‑कर्म में भी पहले से ज्यादा सक्रिय हो गए। वे राजसी वैभव, सुख, मनोरंजन और इच्छाओं की पूर्ति का आनंद लेते रहे, मानो जीवन को दोनों छोर से जीना चाहते हों – एक ओर भोग, दूसरी ओर धर्म।
वैसे तो शुक्र ने शाप से छूट दी थी कि वह देवयानी के साथ यौवन व्यतीत करें, लेकिन ययाति स्वर्ग की अप्सरा विश्वाची के साथ प्रेम में मगन हो गए थे। यह प्रसंग दिखाता है कि पुनः मिली शक्ति और यौवन मनुष्य को कितनी आसानी से आकर्षण की ओर खींच लेते हैं।
सहस्त्र वर्ष बीतते‑बीतते ययाति को विरक्ति हो गई। उन्हें अनुभव हुआ कि इच्छाएँ भोग से शांत नहीं होतीं, बल्कि और बढ़ती हैं – जैसे अग्नि में घी डालने से अग्नि और प्रबल होती है।

तब उन्होंने पुरु को यौवन लौटाकर राजा बना दिया और स्वयं वन में तप करने लगे।
वनगमन, तपस्या और स्वर्ग की प्राप्ति
वन में जाकर ययाति ने राजसी जीवन का पूरी तरह त्याग कर दिया। जो राजा कभी विशाल महलों में रहते थे, वही अब साधारण तपस्वी की तरह जीवन बिताने लगे।
उन्होंने अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण प्राप्त किया, ऋषियों की सेवा की और क्रोध तथा अहंकार को जीतने का प्रयास किया। देवताओं और पितरों के लिए नियमित अनुष्ठान किए, अतिथियों का सत्कार कभी नहीं छोड़ा। धीरे‑धीरे उनकी तपस्या और कठोर होती गई।
कहा जाता है कि उन्होंने लंबे समय तक केवल प्राकृतिक रूप से प्राप्त फल और वन की वस्तुओं से जीवन चलाया, फिर कुछ समय केवल जल पर रहे और अंततः वायु के सहारे तप करने लगे।
ययाति की कथा में वर्णित है कि उन्होंने ऐसी कठोर साधना की जिसमें चारों ओर अग्नि प्रज्वलित होती थी, ऊपर सूर्य की तपिश होती थी और वे एक पैर पर खड़े होकर ध्यान करते थे। उनकी तपस्या की चर्चा तीनों लोकों में होने लगी। देवता, ऋषि और महापुरुष उनके तप से प्रभावित हुए।
अंततः अपने तप, यज्ञ और पुण्य‑कर्मों के प्रभाव से राजा ययाति को स्वर्गलोक की प्राप्ति हुई। स्वर्गलोक में देवताओं ने राजा ययाति का आदरपूर्वक स्वागत किया। वे लंबे समय तक देवलोक के सुखों का अनुभव करते रहे।
ययाति की कथा का अगला भाग पढ़ेंः आखिर क्यों ययाति को इंद्र ने स्वर्ग से धरती पर फेंक दिया। ययाति धरती पर कहां गिरा और क्यों उसे फिर से मिल गया स्वर्ग. इसकी बड़ी रोचक कहानी है. इस लिंक से पढ़ेंः
राजा ययाति की कथा: कामासक्त भोगी कैसे बन गया संन्यासी
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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