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श्री रामेश्वरम में ज्योतिर्लिंग की स्थापना के सम्बन्ध में एक अन्य ऐतिहासिक कथा भी प्रचलित है. लंका पर विजय प्राप्त करने के बाद अयोध्या लौटते समय श्रीराम ने समुद्र लांघने के बाद गन्धमादन पर्वत पर रुककर विश्राम किया.
उनके साथ सीताजी तथा अन्य सभी सेनानायक थे. श्रीराम के आगमन का समाचार सुनकर बहुत सारे ऋषि-महर्षि दर्शन के लिए पहुंचे. ऋषियों ने श्रीराम से कहा आपने पुलस्त्य कुल का विनाश किया है, जिससे आपको ब्रह्महत्या का पातक लग गया है.
श्रीराम ने ऋषियों से इस दोष से मुक्ति का रास्ता पूछा. ऋषियों ने आपस में विचार-विमर्श के बाद श्रीराम को बताया कि आप एक शिवलिंग की स्थापना कर शास्त्रीय विधि से उसकी पूजा कीजिए. शिवलिंग पूजन से आप सब प्रकार से दोषमुक्त हो जाएंगे.
ऋषियों की सभा में शिवलिंग स्थापना का निर्णय होने के बाद श्रीराम ने हनुमानजी को कि आप कैलाश जाकर महादेव की आज्ञा से एक शिवलिंग लाइए. हनुमानजी पवनवेग से कैलाश पहुँच गए किन्तु शिव के दर्शन नहीं मिले.
हनुमानजी ने महादेव का ध्यान किया. उनकी आराधना से प्रसन्न शिवजी ने उन्हें दर्शन दिया. उसके बाद शंकरजी से पार्थिव शिवलिंग प्राप्त कर गन्धमादन वापस आ गए.
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