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भगवान शिव के जीवन में ज्ञान का सागर छिपा है. आज शिवजी के बैल पर विवाह होकर जाने और पंचामृत के प्रिय प्रसाद होने पर कुछ चर्चा करेंगे. इन दोनों के महत्व को समझेंगे.

आमजन विवाह के लिए घोड़ी पर जाते हैं पर शिवजी विवाह के लिए बैल पर सवार होकर गए. ऐसा क्यों पंचामृत उनका प्रिय प्रसाद है.

घोड़ी सर्वाधिक कामुक जीव है. उसपर सवार होकर जाने में संदेश है कि दूल्हा काम के वश में होने के लिए नहीं बल्कि घोड़ी रूपी कामवासना को अपने वश में करने के लिए विवाह बंधन में बंधने जा रहा है.

शिवजी ने काम को भस्म किया था. काम उनके जीवन में महत्वहीन है. इसलिए वह विवाह के लिए धर्म रूपी बैल पर सवार होकर गए. इससे शिक्षा मिलती है कि विवाह का पवित्र बंधन नवदंपती को धर्म के मार्ग पर अग्रसर करता है.

सावन में कामदेव की सेना वर्षा की बौछारें व सुगंधित पवन कामवासना जागृत करती है. सावन में शिव की पूजा का विशेष महत्व इसलिए हो जाता हैं क्योंकि शिव काम की प्रबलता का नाश करके पतन से बचाते हैं.

शिवजी को चढ़ने वाले पंचामृत में भी एक गूढ़ संदेश है. पंचामृत दूध, दही, शहद व घी को गंगाजल में मिलाकर बनता है.

दूधः जब तक बछड़ा पास न हो गाय दूध नहीं देती. बछड़ा मर जाए तो उसका प्रारूप खड़ा किए बिना दूध नहीं देती. दूध मोह का प्रतीक है.

शहदः मधुमक्खी कण-कण भरने के लिए शहद संग्रह करती है. इसे लोभ का प्रतीक माना गया है.

दहीः इसका तासीर गर्म होता है.क्रोध का प्रतीक है.

घीः यह समृद्धि के साथ आने वाला है और अहंकार का प्रतीक है.

गंगाजलः भगीरथ के पूर्वजों ने पितरों की मुक्ति के लिए शिवजी की उपासना की और गंगाजल को पृथ्वी पर लेकर आए. यह मुक्ति का प्रतीक है. गंगाजल मोह, लोभ, क्रोध और अहंकार को समेटकर शांत करता है.

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