एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा- भगवन ! विष्णु-भगवान की यह कैसी माया है जो सारे जगत को मोहित कर देती है. मैं इस रहस्य को जानने के लिए बड़ा उत्सुक हूं.
इस पर भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया- महाराज युधिष्ठिर, इसी प्रकार का प्रश्न नारद ने भी श्रीहरि से पूछा था. नारद ने उनसे अपनी माया दिखाने का हठ भी किया.
श्रीविष्णु ने नारद की अभिलाषा को टालते हुए कहा- माया से आप का क्या काम मुनिवर, वह तो सांसारिक मोह में फंसे जीवों के लिए है. आप कुछ और मांग लें.
नारदजी विनम्रतापूर्वक बोले- श्री हरि! मुझे किसी वर की इच्छा नहीं है. भगवन! आप अपनी माया के ही दर्शन कराइए. उसे देखने की इच्छा बड़ी बलवती हो रही है. नारद के बार-बार आग्रह पर नारायण ने नारदजी की बात स्वीकार ली.
नारायण ने नारदजी की अँगुली पकड़ ली. अगले ही क्षण वे श्वेतद्वीप नाम के स्थान पर थे. इसी क्षण भर में नारायण ने शिखा, जनेऊ कमण्डलु, मृगचर्म धारण कर एक वेदपाठी बूढे ब्राह्मण यज्ञशर्मा का रूप धारण कर चुके थे.
भगवान ने नारद जी से कहा. यह स्थान तो तीर्थस्थान जैसा उत्तम लगता है, हमें कान्यकुब्ज नाम के इस नगर में प्रवेश से पहले इस सरोवर में स्नान कर लेना चाहिए. यह कह कर भगवान सरोवर में जाकर शीघ्र ही बाहर आ गये.
भगवान के पश्चात नारदजी भी स्नान करने के लिये सरोवर में उतरे. वे नहा कर बाहर निकले तो उन्होंने अपने को दिव्य कन्या के रूप में पाया जो हर प्रकार से सुंदर व शुभ लक्षणों से सम्पन्न थी.
भगवान तत्काल अन्तर्धान हो गए. कन्या ने अपने के अकेले पाया. वह भयभीत हो इधर-उधर देख ही रही थी कि अपनी सेनाओं के साथ राजा तालध्वज वहाँ पहुंचा.
सुन्दरी को देख कर राजा बोला- तुम कौन हो, कहाँ से आयी हो? देवी हो या अप्सरा? कन्या ने कहा- मेरे माता-पिता नहीं हैं. न मेरा विवाह हुआ है,कोई आश्रय नहीं है, अब आपकी ही शरण में हूँ.
राजा खुश हुआ उसे साथ ले कर राजधानी पहुँचा, उससे विवाह कर लिया. विवाहोपरांत शीघ्र ही वह गर्भवती हुई और एक तुंबी यानी लौकी को जन्म दिया.
इस लौकी में बीचसमान पचास छोटे-छोटे दिव्य शरीर वाले बालक थे जो बहुत बलशाली और युद्ध की कला में पारंगत थे. इन सब को घी से भरे एक बहुत बड़े कुंड में छोड़ दिया गया.
ऐसा करते ही वे बालक तत्काल पुष्ट हो गए. फिर उनकी संतानें हुईं. माया के प्रभाव से सबकी संख्या इसी प्रकार बढ़ने लगी. कुछ ही दिनों में रानी के पुत्र और पौत्रों की संख्या में बहुत बढ गयी.
वे सभी बहुत घमंडी तथा विलासी हो गए. उनमें लालच आ गया और सिंहासन प्राप्त करने के लिए झगड़ने लगे. सत्ता के लिए शीघ्र ही एक हिंसक संघर्ष हुआ और कुछ ही दिनों में आपसी लड़ाई के चलते सभी मारे गए..
अपने वंश का विनाश देख रानी छाती पीटकर विलाप करने लगी. राजा भी शोक से पीड़ित हो रोने लगा. इसी समय एक ब्राह्मण दो शिष्यों के साथ वहाँ आया. ब्राह्मण राजा तथा रानी को उपदेश देने लगा.
ब्राह्मण ने कहा, व्यर्थ ही रोते हो. यह सब विष्णु की माया है. विष्णुमाया ऐसी है कि सैकड़ों चक्रवर्ती और हजारों इंद्र उसी तरह नष्ट कर हो जाते हैं जैसे दीपक को तेज चलती हवा बुझा देती है.
रावण, त्रिकूट पर्वत जैसे दुर्ग, समुद्र जैसी खाई से घिरी स्वर्ण पुरी लंका में रहता था. सभी शास्त्रों और वेदों के ज्ञाता शुक्राचार्य जैसे मंत्री थे. कुबेर का सारा धन उसके पास था. मायावी राक्षसगण जिसके सैनिक थे, वह भी माया के वशीभूत हो नष्ट हो गया.
काल के कोप से युद्ध में, घर में, पर्वत पर, अग्नि में, गुफा में अथवा समुद्र या पाताल में, इन्द्रलोक में, मन्त्र, औषध, शस्त्र आदि से भी कोई कितनी भी अपनी रक्षा करे, नहीं बच सकता, जो होना होता हैं, वह होता ही है.
कोई दुःख के सागर में गोते खाता आंसू टपकाता, रोता हैं. कोई प्रसन्न मन नाचता हैं. कोई धन के लिए अनेक उपाय करता हैं, तो कोई षड्यंत्र रचता रहता है. इस माया के प्रभाव से संसार के सभी जीव, पुत्र, स्त्री, धन आदि में आसक्त हो रोते-गाते रहते हैं |
इतना उपदेश देकर ब्राह्मण ने रानी का हाथ पकड़ लिया. वह ब्राह्मण स्वयं भगवान विष्णु थे. उन्होंने कहा- नारदजी! यह माया विष्णु ने स्वयं निर्मित की है. तुमने विष्णु की माया देख ली.
अब उठो ! स्नानकर अपने मृत पुत्र-पौत्रों को अर्घ्य देकर अपना कर्तव्य पूरा करो. इतना कहकर भगवान ने नारदजी को उसी सरोवर में स्नान कराया जिसमें नहा कर वे सुंदरी बने थे.
स्नान करते ही नारद मुनि अपने वास्तविक रूप में आ गए. राजा ने देखा कि यह तो यह मेरी रानी नहीं, जनेऊ पहने, जटाधारी, दण्ड-कमण्डल और वीणा लिए, मुनि महाराज हैं तो वह हतप्रभ रह गया.
अगले ही क्षण भगवान नारद का हाथ पकड़कर श्वेतद्वीप आ गए और नारद से पूछा- नारदजी! आपने मेरी माया देख ली. माया कष्टकारी और बांधने वाली है. इसलिए में साधुजनों को इससे मुक्त रखता हूं.
नारदजी ने भी संकोच में भरकर उन्हें प्रणाम किया. कोई उत्तर देते इससे पूर्व भगवान् अंतर्धान हो गए.
(भविष्य पुराण से)
संकलनः सीमा श्रीवास्तव
संपादनः राजन प्रकाश