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भृगु भगवान भोलेनाथ की परीक्षा लेने कैलाश पहुंचे. उस समय महादेव अपनी पत्नी देवी पार्वती के साथ जल-विहार कर रहे थे. शिवगणों ने भृगु को उनसे मिलने नहीं दिया.
भृगु ने जब कहा कि वह शिवजी की परीक्षा लेने आए हैं तो उनके गण क्रोधित हो गए. गणों ने भृगु का खूब अपमान किया और उन्हें कैलाश से भगा दिया. नाराज भृगु ने शिव को तमोगुणी मानते हुए कहा कि आज से उनके लिंग की ही पूजा होगी.
वहां से भृगु अपने पिता ब्रह्माजी के पास ब्रह्मलोक पहुंचे. ब्रह्मदेव अपनी पत्नी के साथ अंतःपुर में बैठे थे. ब्रह्मदेव ने सोचा-पुत्र से क्या संकोच, उन्होंने भृगु को वहीं बुला लिया. उन्होंने भृगु से पूछ लिया- कहो पुत्र क्यों आना हुआ.
भृगु को ठेस लगी. विचार आया कि ब्रह्मदेव ने जानबूझकर यह प्रश्न किया है. क्या वह नहीं जानते होंगे कि मैं उनकी परीक्षा लेने आया हूं. ब्रह्मा उन्हें पुत्र से ज्यादा स्वीकार करने को तैयार नहीं.
उन्हें लगा कि ब्रह्मा अपने पुत्र को देवताओं द्वारा दिए गए सम्मान से दुखी हैं इसलिए उसे उचित सम्मान नहीं दे रहे. उन्होंने ब्रह्माजी को बताया कि मैं आपकी परीक्षा लेने आया था किंतु आप का आचरण उचित नहीं है.
ब्रह्माजी को क्रोध आया. उन्होंने भृगु को दंडित करने के लिए अपने अनुचरों को उनके पीछे दौड़ाया. भृगु वहां से भी जैसे-तैसे भागे और जाते-जाते शाप देते गुए कि ब्रह्मदेव आप रजोगुणी हैं. आपकी कहीं पूजा नहीं होगी.
तमतमाए भृगु भगवान विष्णु के पास क्षीर सागर पहुंचे.
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आपके शुभ वचनों के लिए हृदय से कोटि-कोटि आभार.
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प्रियवर बंधु
आपकी कथा विचार करने योग्य है। परंतु आपने गलत ज्ञान दिया है।
विष्णु जी को ही बार बार अवतार इसलिए लेना पड़ता है क्योंकि वो सृष्टि के पालनहार हैं।
और जब मनुष्य जाती पर कोई संकट आता है तब पालनहार होने की वजह से उन्हें ही अवतार लेना पड़ता है।
अच्छा चलो आपकी बात मन भी लें तो इसका कोई सबूत है मतलब ये कथा किस पुराण या वेद में लिखा है। या ऐसे ही कोई कहानी बना दी।
कृपया उत्तर अवश्य दें।
यह कथा पुराण आधारित ही है.