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सूतजी बोले- ऋषियों इस प्रकार विधि-विधान से पूजा करने से व्यक्ति पग-पग पर सिद्धि लाभकर आनंदनिमग्न होता है. उसके उपरांत ब्रह्माजी ने सभी देवों, महात्माओं, सिद्धों, गंधर्वों एवं विप्रो को संबोधित करते हुए कहा-
यदि आप लोग अपने कल्याण, उद्धार और सद्गति के इच्छुक हैं तो मेरे साथ क्षीर सागर के किनारे आइए. ब्रह्माजी के निमंत्रण को अहोभाग्य मानते हुए सभी देव व मुनि करबद्ध होकर क्षीर सगार के तट पर पहुंचे.
विष्णुजी ने सबका स्वागत करते हुए उनके आगमन का कारण पूछा. इस पर देवों ने कहा- भगवन हम यह जानने को इच्छुक हैं कि अपने सभी दुखों से मुक्ति के लिए हमें नित्य नियम से किसकी सेवा करनी चाहिए.
इस पर विष्णु भगवान बोले- ब्रह्माजी और सभी देवता इस तथ्य से अच्छी प्रकार परिचित हैं फिर भी आप मेरे मुख से सुनना चाहते हैं तो सुनिए-
सेव्यः सेव्यः सदा देवः शंकरः सर्व दुःखहा।
त्याज्यं तदर्चनं नैव कदापि सुखमीप्सुभिः।।
नित्यप्रति अनन्य भाव भाव से आराध्यदेव एकमात्र भगवान शंकर हैं. सुख के इच्छुक प्राणियों को उनके पूजन से कभी विमुख नहीं होना चाहिए. यह बताकर शिवजी ने वहां पधारे सभी देवों और महात्माओं को शिवलिंग प्रदान किए तथा शिवपूजन की विधि विस्तार बिताकर सबको विदा किया.
सूतजी ने यहां तक प्रसंग सुनाया तो ऋषियों की प्रसन्नता की कोई सीमा न रही. उन्होंने सूतजी से कहा- हे व्यासशिष्य महात्मन्, आप हमें यह बताने की कृपा करें कि शिवजी को किन पुष्पों से और कितने समर्पण करना चाहिए, उसका क्या लाभ है.
सूतजी बोले- विप्र जनों यह प्रश्न नारदजी ने ब्रह्माजी से किया जिसका उन्होंने जो उत्तर दिया था वह मैं आपसे अब कहता हूं. मैं आपको नारदजी और ब्रह्माजी के मध्य हुए संवाद को कहूंगा. उन्होंने शिवजी की पूजा के लिए पुष्प एवं उनकी संख्या के विषय में विस्तार से कहा है.
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