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श्लोक- 5 एवं 6
धृष्तकेतुश्चेकितान काशिराजस्च वीर्यवान।
पुरुजितकुन्तिभोजश्च शैव्यस्च नरपुंगवः।।5।।
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः।।6।।
सरलार्थः दुर्योधन द्रोणाचार्य को पांडव सेना का परिचय देते हुए कहता हैः
इसमें धृष्टकेतु, चेकितान, काशिराज, पुरुजित, कुंतिभोज और शैव्य जैसे श्रेष्ठ वीर हैं तो पराक्रमी युधामन्यु, बलवान उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु और द्रौपदी के पांचों पुत्र मनुष्यों में श्रेष्ठ वीर हैं.
भावार्थ-
पांडवों की तरह दुर्योधन भी गुरू द्रोण का शिष्य है और अत्यंत बलशाली तथा युद्ध नीतियों का जानकार है.
उसने अपने पक्ष के वीरों की शक्ति को पहचानकर ही पांडवों से युद्ध का निर्णय किया था. उसकी सेना में भी ऐसे-ऐसे महारथी हैं जिनसे युद्ध का साहस देवताओं की सेना के लिए भी आसान नहीं.
फिर भी वह एक कुशल योद्धा के समान दुर्योधन अपने शत्रु की सेना का आंकलन कर रहा है. दुर्योधन शत्रुओं की वीरता का बखानकर द्रोणाचार्य को पूरे सामर्थ्य से युद्ध के लिए उसका रहा है.
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