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रावण कहता रहा- वानरों के भरोसे मुझसे युद्ध करने आया था. रात्रि को जब वानर सेना सहित राम और लक्ष्मण दोनों सो रहे थे, तब सेनापति प्रहस्त ने विशाल सेना लेकर आक्रमण किया. और सोते हुए राम और लक्ष्मण के सिर काट लिए.
रावण ने बताया कि इस आक्रमण में सभई वानरवीरों के साथ विभीषण भी मारा गया. अब वहां श्रीराम औऱ लक्ष्मण के अंतिम संस्कार करने को भी कोई नहीं बचा.
रावण ने कहा- तुम्हारे लिए ऐसा भयंकर संहार करना पड़ा. अब तुम्हारा कोई आश्रय नहीं बचा इसलिए अब मुझे पति रूप में स्वीकार कर लो तो सहारा मिल जाएगा.
रावण ने दोनों मायारचित सिर सीताजी के सामने रख दिए और चला गया. सीताजी ने सब प्रकार से देखा. उनकी आकृति, मुद्रा आदि सब राम-लक्ष्मण जैसे थे.
एक तो रावण घोर मायावी, दूसरे सीताजी इतने दिनों तक उसकी कैद में फंसी थीं. विपत्ति काल ने देवी की मति भी हर ली. सीताजी बिलखने लगीं.
विलाप करती हुई कैकेयी को कोसने लगी कि पुत्र को सिंहासन दिलाने के स्वार्थ में रघुकुल का नाश कर दिया. विलाप करती हुई वह मूर्च्छित हो गईं.
जब चेतना लौटी तो फिर विलाप करने लगीं. वह कभी कैकेयी को तो कभी स्वयं को इसके लिए कोसतीं. कभी रावण का नाम लेकर चिल्लातीं कि मेरे शीश भी काट दे.
विलाप करते-करते मूर्च्छित हो जातीं. रावण यह सब देखकर बड़ा प्रसन्न हो रहा था. उसे अपनी चाल सफल होती दिखती थी.
जब सीताजी विलाप कर रही थी उसी समय किसी ने आकर रावण को सूचना दी कि प्रहस्त आवश्यक कार्य से अभी आपके दर्शन करना चाहते हैं.
यह सुनते ही रावण दोनों सिरों को लेकर वहां से चला गया. इस घटना की सूचना विभीषण की पत्नी को मिली. वह अशोक वाटिका में आईं.
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