January 28, 2026

यदि मन में करूणा-ममता न हो तो जीवन निरर्थक हो जाता है

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कसाई के पीछे घिसटती जा रही बकरी ने सामने से आ रहे संन्यासी को देखा तो उसकी उम्मीद बढ़ी. मौत आंखों में लिए वह फरियाद करने लगी- ‘महाराज! मेरे छोटे-छोटे मेमने हैं. आप इस कसाई से मेरी प्राण-रक्षा करें.

मैं जब तक जियूंगी,अपने बच्चों के हिस्से का दूध आपको पिलाती रहूंगी.’ बकरी की करुण पुकार का संन्यासी पर कोई असर न पड़ा. वह निर्लिप्त भाव से बोला- ‘मूर्ख, बकरी क्या तू नहीं जानती कि मैं एक संन्यासी हूं.

जीवन-मृत्यु, हर्ष-शोक, मोह-माया से परे. हर प्राणी को एक न एक दिन तो मरना ही है. समझ ले कि तेरी मौत इस कसाई के हाथों लिखी है. यदि यह पाप करेगा तो ईश्वर इसे भी दंडित करेगा.

‘मेरे बिना मेरे मेमने जीते-जी मर जाएंगे…’

बकरी रोने लगी. ‘नादान, रोने से अच्छा है कि तू परमात्मा का नाम ले. याद रख, मृत्यु नए जीवन का द्वार है. सांसारिक रिश्ते-नाते प्राणी के मोह का परिणाम हैं. मोह माया से उपजता है. माया विकारों की जननी है. विकार आत्मा को भरमाए रखते हैं.’

बकरी निराश हो गई. संन्यासी के पीछे आ रहे कुत्ते से रहा न गया.

उसने पूछा- ‘संन्यासी महाराज, क्या आप मोह-माया से पूरी तरह मुक्त हो चुके हैं?’

लपककर संन्यासी ने जवाब दिया- ‘बिलकुल, भरा-पूरा परिवार था मेरा. सुंदर पत्नी, सुशील भाई-बहन, माता-पिता, चाचा-ताऊ, बेटा-बेटी. बेशुमार जमीन-जायदाद… मैं एक ही झटके में सब कुछ छोड़कर परमात्मा की शरण में चला आ आया.

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सांसारिक प्रलोभनों से बहुत ऊपर…सबकुछ छोड़ आया हूं. मोह-माया का यह निरर्थक संसार छोड़ आया हूं. जैसे कीचड़ में कमल…’ संन्यासी डींग मारने लगा.

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