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नकुल ने आसपास देखा तो उन्हें सामने एक पैर पर खड़ा एक बगुला दिखाई दिया. प्यास से बेचैन नकुल ने ध्यान नहीं दिया. पानी पीते ही उनकी मृत्यु हो गई. नकुल को खोजने, युधिष्ठिर ने सहदेव को भेजा. सहदेव ने भी वह आवाज सुनी, अनसुना किया और पानी पीते ही मृत्यु हो गई.

इसके बाद युधिष्ठिर ने अर्जुन और भीम को भेजा. सबकी वही गति हुई. जब चारो भाई नहीं लौटे तो युधिष्ठिर स्वयं चले. जलाशय के किनारे चारो भाई मृत पड़े थे. ऐसे महावीरों को मारना किसी साधारण जीव के तो बस की बात नहीं है. शरीर पर चोट का भी निशान नहीं, यानी कोई युद्ध भी नहीं हुआ था.

युधिष्ठिर कारण जानने जलाशय में उतरे तो उन्हें भी वही आवाज सुनाई दी. युधिष्ठिर ने कहा मैं आपके सभी प्रश्नों का उत्तर दूंगा लेकिन पहले आप अपने वास्तविक रूप में आएं. बगुले ने एक यक्ष का रूप ले लिया.

युधिष्ठिर ने यक्ष का अभिवादन किया और बोले- यक्ष तुम प्रश्न करो. मैं अपने विवेक के अनुसार उत्तर देने की कोशिश करूंगा.

यक्ष ने प्रश्न किया- कौन हूँ मैं?

युधिष्ठिर– तुम न यह शरीर हो, न इन्द्रियां, न मन, न बुद्धि. तुम शुद्ध चेतना हो, वह चेतना जो सर्वसाक्षी है.

यक्ष– जीवन का उद्देश्य क्या है?

युधिष्ठिर– जीवन का उद्देश्य उसी चेतना को जानना है जो जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है. उसे जानना ही मोक्ष है.

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