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सुमति को पिताजी के कोसने पर बहुत दुःख हुआ, और उसने कहा, पिताजी, नादानी में मुझे समय का ध्यान नहीं रहा मैं इसके लिये आपसे क्षमा मांगती हूं. मुझे लगता है कि मां जगदंबा भी मेरी इस भूल को माफ कर देंगी.

पर अनाथ का गुस्सा शांत न हुआ. वह बोला कि मां जगदंबा की पूजा मेरे लिये जीवन और सब बातों से बढ कर है. मैं उसमें किसी भी तरह की कमी बर्दाश्त नहीं कर सकता. अब मैंने अगर ऐसा कह दिया तो देखना मैं तेरा विवाह किसी निर्धन कुष्ठ रोगी से ही करुंगा.

इस पर सुमति ने अनाथ से कहा आपकी कन्या होने के नाते मैं हर तरह से आपके अधीन हूँ. आप जिससे चाहें मेरा ब्याह कर सकते हैं, किन्तु होगा वही जो मेरे भाग्य में लिखा होगा. आप उसको नहीं बदल सकते.

यह सुन कर अनाथ का क्रोध और बढ़ गया, उसने पक्का इरादा कर लिया कि वह अपनी कर के मानेगा. कुछ बरस बाद उसने ढूंढ कर सुमति का ब्याह एक दरिद्र कुष्ठ रोगी से कर दिया .

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