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शची ने सारी कहानी बतायी तो इंद्र ने कहा, विष्णु ने मेरे ब्रह्म हत्या का पाप टुकड़े टुकड़े कर खत्म कर दिया है अब तुम मां जगदंबा पर विश्वास रख कर गुरु वृहस्पति द्वारा बतायी विधि से उनकी आराधना करती रहो. वे ही राअस्ता बताएंगी और उसकी बुद्धि भ्रमित कर हमारे सारे मनोरथ पूरे करेंगी.

हुआ भी वही, मां ने शची को ऐसी बुद्धि प्रदान की कि वह नहुष के पास जाकर बोली कि, आप के लिये मैं उपलब्ध हूँ यदि आप आज तक किसी भी देवता द्वारा इस्लेमाल न की गयी अनूठी सवारी यानी अटल मुनियों के कांधों पर रखी पालकी में मेरे पास आएं.

इंद्र होने के घमंड में नहुष ने ऐसा ही किया, शची के पास पहुंचने की बेताबी में सप्तऋषियों को सर्प:सर्प: यानी चलो चलो कहते हुए अपशब्द कहे और कोड़े फटकारे. नाराज ऋषियों ने उसे भयंकर शरीर वाला सर्प बन जाने का श्राप दिया और वह तत्काल सांप बन कर धरते पर गिर पड़ा.

वृहस्पति ने यह समाचार सुना तो इसकी सूचना तुरंत इंद्र तक पहुंचा दी. उधर ऋषि मुनियों, देवताओं को यह समाचार मिला तो सब वृहस्पति जी से पता ले कर इंद्र के पास गये और पूरे सम्मान के साथ इंद्र को उनके आसन पर बैठा दिया, साथ ही शची की भी सारी समस्या मां जगदंबा ने दूर कर दी.

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