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महादेव के एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में डमरू धरा दिया. मस्तक पर सुशोभित चंद्रमा जगमगा रहे थे. गंगाजी, जूट जटाओं में थीं.
शिवजी बैल पर सवार होकर चले. बाजे बज रहे थे. देवांगनाएं उन्हें देखकर मुस्कुराकर कटाक्ष कर रही थीं कि ऐसे वर के योग्य दुल्हन संसार में शायद ही हो.
ब्रह्मा, विष्णु सहित समस्त देवताओं के साथ ही शिवजी के समस्त गण भी बाराती थे. शिवगणों में कोई बिना मुख का था तो किसी के अनेक मुख थे, कोई बिना हाथ पैर का था तो किसी के कई हाथ पैर थे.
किसी की एक भी आँख नहीं थी तो किसी के बहुत सारी आँखें थीं, कोई पवित्र वेशधारण किए था तो कोई बहुत ही अपवित्र वेश धारण किए था. सब मिलाकर प्रेत, पिशाच और योगनियों की फौज चली आ रही थी बारात के रूप में.
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