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बुद्ध ने कहा- अच्छी बात है. अब मैं इसको खोलने का प्रयास करता हूँ. इतना कहकर वह रस्सी के दोनों सिरों को खींचने लगे. उन्हें ऐसा करते देख शिष्यों ने कहा- भगवन इससे गांठें खुलने के स्थान पर और ज्यादा कस जायेंगी. फिर तो शायद खोलना संभव भी न हो पाए.
तब बुद्ध ने पूछा- यदि ऐसा है तो फिर हमें इसकी गांठें खोलने के लिए क्या करना होगा क्योकि गांठें लग जाने के बाद इस रस्सी की उपयोगिता तो बहुत कम हो चुकी है? रास्ता निकालो.
इस पर एक शिष्य ने कहा- रस्सी को खींचने से पहले हमें यह समझना होगा कि इनमें गांठें कैसे लगाई गईं हैं. फिर उसके अनुरूप निर्णय करना होगा कि किस दिशा में रस्सी को खींचने की आवश्यकता है.
बुद्ध इस उत्तर से संतुष्ट थे. वह बोले- ठीक. यानी समस्या का कारण जाने बिना उसका निवारण असम्भव है. इन गाठों को जिस क्रम में लगाया गया है उसके विपरीत क्रम में अगर खींचा जाए तो यह आसानी से खुल जायेंगी.
यदि उसी क्रम में खींचा जाए तो खुलने की बजाय इतना कस जाएंगी कि रस्सी अनुपयोगी हो जाए. इसे फेंकना ही पड़े. यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है. समस्या के मूल में ही उसका निदान छुपा होता है.
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