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उस दिन तो एक के बाद एक करके मुझे जो उत्तर मिल रहे थे उससे मैं सोचने और कौतूहल में एक स्थान से दूसरे स्थान तक दौड़ लगाने को विवश हो गया था.

मैं तत्काल पृथ्वी के पास पहुंचा और बोला- माते संसार के सारे आश्चर्य तुम्हारे ऊपर ही रहते हैं. इसलिए तुम धन्य हो. तुम्हारी धैर्य, धारण करने की क्षमता अचरज में डालने वाली है.

परंतु पृथ्वी तो यह प्रशंसा सुनते ही तुनक गईँ.

वह कुछ रोष से भरकर बोलीं- देवताओं के बीच कलह पैदा करने वाले नारद मुझमें तो कहीं से न अचरज कोई करने वाली बात है न मैं धन्य ही हूं. ऐसे बहुत से अन्य गुणी हैं जिनकी क्षमता आप देखेंगे तो मैं उनके समक्ष तुच्छ लगूंगी.

मैंने पृथ्वी से पूछा- फिर आप ही बताएं कि धन्य कौन है. आज मैं इस प्रश्न को लेकर बहुत व्याकुल हूं.

पृथ्वी ने कहा- धन्य तो पर्वत हैं जो मुझको भी धारण किए रहने के नाते भूधर कहलाते हैं. उन पर पवित्र तीर्थ स्थित हैं, देवी-देवता और ऋषि मुनि बसते हैं. तो नारद मेरे विचार से पर्वत ही धन्य हैं, मैं नहीं.

वहां से विदा लेकर मैं पर्वतराज के पास पहुंचा और बोला- आप तो वास्तव में इतने विशालकाय हैं कि अचरज में डाल देते हैं. आपके गर्भ से ही सोना और दूसरी धातुएं, औषधियां और जीवनदायिनी नदियां निकलती हैं, आप सचमुच धन्य हैं.

पर्वतराज ने कहा- मुनिवर हम कैसे धन्य हो सकते हैं और हममें ऐसा क्या जो आश्चर्य में डालने वाला हो सकता है. धन्य तो जगत निर्माता ब्रह्माजी हैं जिन्होंने धरती, आकाश, समुद्र, नदी और पर्वत सब कुछ रचा है.

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