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देवशर्मा की बात सुनकरक मित्रवान ने एक क्षण तक कुछ विचार किया ।उसके बाद इस प्रकार कहाः ‘विद्वन ! एक समय की बात है ।मैं वन के भीतर बकरियों की रक्षा कर रहा था ।इतने में ही एक भयंकर व्याघ्र पर मेरी दृष्टि पड़ी, जो मानो सब को ग्रास लेना चाहता था ।मैं मृत्यु से डरता था, इसलिए व्याघ्र को आते देख बकरियों के झुंड को आगे करके वहाँ से भाग चला, किंतु एक बकरी तुरन्त ही सारा भय छोड़कर नदी के किनारे उस बाघ के पास बेरोकटोक चली गयी।

फिर तो व्याघ्र भी द्वेष छोड़कर चुपचाप खड़ा हो गया। उसे इस अवस्था में देखकर बकरी बोलीः ‘व्याघ्र ! तुम्हें तो अभीष्ट भोजन प्राप्त हुआ है ।मेरे शरीर से मांस निकालकर प्रेमपूर्वक खाओ न ! तुम इतनी देर से खड़े क्यों हो? तुम्हारे मन में मुझे खाने का विचार क्यों नहीं हो रहा है?’

व्याघ्र बोलाः बकरी ! इस स्थान पर आते ही मेरे मन से द्वेष का भाव निकल गया। भूख प्यास भी मिट गयी ।इसलिए पास आने पर भी अब मैं तुझे खाना नहीं चाहता ।

व्याघ्र के यों कहने पर बकरी बोलीः ‘न जाने मैं कैसे निर्भय हो गयी हूँ। इसका क्या कारण हो सकता है? यदि तुम जानते हो तो बताओ ।’

यह सुनकर व्याघ्र ने कहाः ‘मैं भी नहीं जानता ।चलो सामने खड़े हुए इन महापुरुष से पुछें ।’ ऐसा निश्चय करके वे दोनों वहाँ से चल दिये ।उन दोनों के स्वभाव में यह विचित्र परिवर्तन देखकर मैं बहुत विस्मय में पड़ा था ।इतने में उन्होंने मुझसे ही आकर प्रश्न किया।वहाँ वृक्ष की शाखा पर एक वानरराज था ।उन दोनों साथ मैंने भी वानरराज से पूछा ।
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