हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:fb]
तराजू के एक पलड़े में श्रीकृष्ण बैठे. दूसरे पलड़े में सभी रानियां अपने−अपने आभूषण चढ़ाने लगीं, पर पलड़ा हिला तक नहीं. सत्यभामा ने कहा, यदि मैंने इन्हें दान किया है तो मैं, उबार भी लूंगी. उन्होंने अपने सारे आभूषण चढ़ा दिए, पर पलड़ा नहीं हिला.
सारा हाल जब श्रीकृष्णजी की पटरानी रुक्मिणीजी ने सुना तो वह तुलसी पूजन करके उसकी पत्ती ले आईं. उस पत्ती को पलड़े पर रखते ही तुला का वजन बराबर हो गया. नारद तुलसी दल लेकर चले गए. तुलसी के प्रभाव से ही वह अपने व अन्य रानियों के सौभाग्य की रक्षा कर सकीं. रानियों ने रुक्मिणी से इसका कारण पूछा.
रूक्मिणी बोली- हम सब ने श्रीकृष्ण को पतिरूप में पाने के लिए तरह-तरह के यत्न किए तब हमारी मनोकामना पूरी हुई. यह हमारा सौभाग्य था किंतु तुलसी ने ऐसी कामना कभी नहीं रखी. श्रीहरि ने तुलसी को स्वयं अपनी वल्लभा (प्रेयसी) के रूप में स्वीकार किया.
प्रभु की दृष्टि में सबसे बड़ा प्रेम वह है जो निष्काम हो. इसलिए पादप(पौधा) रूपी देवी तुलसी का स्थान प्रभु की दृष्टि में हमसे श्रेष्ठ है. सत्यभामा का रूप का गर्व चूर हुआ.
संकलन व संपादन: राजन प्रकाश
अब आप बिना इन्टरनेट के व्रत त्यौहार की कथाएँ, चालीसा संग्रह, भजन व मंत्र , श्रीराम शलाका प्रशनावली, व्रत त्यौहार कैलेंडर इत्यादि पढ़ तथा उपयोग कर सकते हैं.इसके लिए डाउनलोड करें प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प.
Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
ये भी पढ़ें-
ईश्वर कैसे मिलेंगे? क्या है ईश्वर की प्राप्ति का विधान है?
करियर की बाधाओं का ज्योतिष से निकाल सकते हैं हलः करियर में सफलता के लिए सरल और बिना खर्च वाले उपाय
जानिए कौन हैं श्रेष्ठ अग्नि या जल-ब्रह्म पुराण की यह रोचक कथा
प्रभु श्रीराम का सम्मान, धर्मसंकट में सेवक श्री हनुमानः हनुमानजी की भक्ति कथा
हम ऐसी कथाएँ देते रहते हैं. Facebook Page Like करने से ये कहानियां आप तक हमेशा पहुंचती रहेंगी और आपका आशीर्वाद भी हमें प्राप्त होगा: Please Like Prabhu Sharnam Facebook Page