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श्रीहरि ने आकाशवाणी की- ऋषियों आपका दायित्व है मनुष्यों को राह दिखाना. आप ऐसे विवादों को जन्म न दें. दोनों देव समान रूप से पूजनीय हैं. इनमें भेद करना उचित नहीं. ऋषियों को इस उत्तर की आशा नहीं थी.
वे एक लोक से दूसरे लोक का चक्कर काटते अब थक चुके थे लेकिन निर्णय नहीं हो पाया. हारकर गौतमी नदी के पास पहुंचे. उनसे निर्णय करने का अनुरोध किया.
गौतमी ने कहा- देव इसलिए देव हैं और पूजनीय हैं क्योंकि वे मनुष्यों की तरह श्रेषठता के तुच्छ विवाद में नहीं पड़ते. अग्नि और जल एक दूसरे के पूरक हैं. अग्नि की उत्पत्ति भी जल से हुई है.
बिना जल से स्नान कराए स्वयं अग्नि भी प्रकट नहीं होते. अग्नि प्रकट नहीं हों तो यज्ञा आदि होंगे नहीं. यदि यज्ञ नहीं हुए तो सभी देवों के साथ स्वयं वरुण की शक्ति भी कम होगी.
वरुण की पूजा से यज्ञ आरंभ होगा किंतु अग्नि से उसे सार्थकता मिलेगी. वरुण अग्नि का आभार भी प्रकट करेंगे. इसलिए यज्ञ या हवन के बाद अंत में जल का छिड़काव किया जाता है. (ब्रह्मपुराण की कथा)
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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