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प्रकृत्य ऋषि का रोज का नियम था कि वह नगर से दूर जंगलों में स्थित शिवमंदिर में भगवान् शिव की पूजा में लींन रहते थे. कई वर्षो से यह उनका अखंड नियम था.

उसी जंगल में एक नास्तिक डाकू अस्थिमाल का भी डेरा था. अस्थिमाल का भय आसपास के क्षेत्र में व्याप्त था. अस्थिमाल बड़ा नास्तिक था. वह मंदिरों में भी चोरी-डाका से नहीं चूकता था.

एक दिन अस्थिमाल की नजर प्रकृत्य ऋषि पर पड़ी. उसने सोचा यह ऋषि जंगल में छुपे मंदिर में पूजा करता है, हो न हो इसने मंदिर में काफी माल छुपाकर रखा होगा. आज इसे ही लूटते हैं.

अस्थिमाल ने प्रकृत्य ऋषि से कहा कि जितना भी धन छुपाकर रखा हो चुपचाप मेरे हवाले कर दो. ऋषि उसे देखकर तनिक भी विचलित हुए बिना बोले- कैसा धन? मैं तो यहाँ बिना किसी लोभ के पूजा को चला आता हूं.

डाकू को उनकी बातों पर विश्वास नहीं हुआ. उसने क्रोध में ऋषि प्रकृत्य को जोर से धक्का मारा. ऋषि ठोकर खाकर शिवलिंग के पास जाकर गिरे और उनका सिर फट गया. रक्त की धारा फूट पड़ी.
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