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मोर इससे गदगद हो गया. उसने कहना शुरू किया- जय हो राधा रानी आज तक सुना था की आप करुणा की मूर्ति हैं लेकिन आज यह साबित हो गया.
राधाजी ने मोर से पूछा कि वह उन्हें करुणामयी क्यों कह रहा है. मोर ने बताया कि कैसे वह सालभर श्याम नाम की धुन रमाता रहा लेकिन कन्हैया ने उसे कभी पानी भी न पिलाया.
राधाजी मुस्कराईं. वह मोर के मन का टीस समझ गई थीं और उसका कारण भी.
राधाजी ने मोर से कहा कि तुम गोकुल जाओ. लेकिन इसबार पुराने गीत की जगह यह गाओ- जय राधे राधे राधे, बरसाने वाली राधे.
मोर का मन तो नहीं था करुणामयी को छोडकर जाने का, फिर भी वह गोकुल आया राधाजी के कहे मुताबिक राधे-राधे गाने लगा.
भगवान श्रीकृष्ण के कानों में यह भजन पड़ा और वह भागते हुए मोर के पास आए, गले से लगा लिया और उसका हाल-चाल पूछने लगे.
श्रीकृष्ण ने पूछा कि मोर तुम कहां से आए हो. इतना सुनते ही मोर भड़क गया.
मोर बोला- वाह छलिये एक साल से मैं आपके नाम की धुन रमा रहा था, लेकिन आपने तो कभी पानी भी नहीं पूछा. आज जब मैंने पार्टी बदल ली तो आप भागते चले आए.
भगवान मुस्कुराने लगे. उन्होंने मोर से फिर पूछा कि तुम कहां से आए हो.
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