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युद्ध के मैदान में छायासीता को देखकर मूलकासुर गरजा, तू कौन? अभी भाग जा.मैं औरतों पर मर्दानगी नही दिखाता. छायासीता ने भी भीषण आवाज करते हुये कहा,‘मैं तुम्हारी मौत-चण्डी हूँ. तूने मेरा पक्ष लेने वाले मुनियों और ब्राह्मणों को खा डाला था, अब मैं तुम्हें मारकर उसका बदला चुकाउंगी.

इतना कहकर छायासीता ने मूलकासुर पर पाँच बाण चलाये. मूलक ने भी जवाब में बाण चलाये. कुछ देर बहुत घोर युद्द हुआ पर अन्त में ‘चण्डिकास्त्र’ चलाकर छायासीता ने मूलकासुर का सिर उड़ा दिया. वह लंका के दरवाजे पर जा गिरा.

राक्षस हाहाकार करते हुए इधर उधर भाग खड़े हुए. छायासीता लौटकर सीता केशरीर में प्रवेश कर गयी. मूलका सुर से दुखी लंका की जनता ने मां सीता की जय जयकार की और विभीषन ने उन्हें धन्यवाद दिया. कुछ दिनों तक लंका में रहकर श्रीराम सीता सहित पुष्पकयान से अयोध्या लौट आये.
(यह कथा आनन्द रामायण से ली गई है.)

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