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परंतु नचिकेता तो अड़े रहे. यम ने नचिकेता का ध्यान भटकाने के लिए भुवन मोहन अस्त्र का प्रयोग किया. सुर-दुर्लभ सुन्दरियां और समस्त भोग-सामग्रियों का प्रलोभन दिया, पर नचिकेता अडिग रहे.

आखिर यम हार गए. यमराज ने समझ लिया कि यह बालक सचमुच उस ज्ञान को प्राप्त करने का अधिकारी है.

यमराज ने नचिकेता के वैराग्य और भोग-विलास के प्रति अनासक्ति की प्रशंसा की फिर बोले- आप बड़े भाग्यवान हैं. विवेकशील और वैराग्य सम्पन्न पुरुष ही ब्रह्म ज्ञान प्राप्ति के अधिकारी हैं. आप उसके योग्य हैं.

यम ने कहा- आत्मा चेतन है. न जन्मता है, न मरता है. न किसी से उत्पन्न हुआ है और न इससे कोई उत्पन्न होता है. यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और सनातन है तथा शरीर के नष्ट होने पर भी बना रहता है.

यम ने कहा- वह न तो वेद के प्रवचन से प्राप्त होता है न विशाल बुद्धि से मिलता है और न केवल जन्म भर शास्त्रों के श्रवण से ही मिलता है. वह उन्हीं को प्राप्त होता है जिनकी वासनाएं शान्त हो चुकी हैं, कामनाएं मिट चुकी हैं.

आत्म-ज्ञान प्राप्त करने के बाद नचिकेता पृथ्वी पर लौटे तो समस्त तपस्वी समुदाय उनके स्वागत के लिए खड़ा था.

ऋषियों ने कहा- पिता को अनिष्ट रोकने और स्वयं मृत्यु को प्रसन्न कर आत्मा का दिव्य रहस्य प्राप्त करने वाले नचिकेता की पितृभक्ति की कथा तब तक गाई जाएगी जब तक संसार है.

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश

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