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यम के अनुरोध पर नचिकेता ने तीन वर मांगे. पहला वर मांगा- प्रभो! मेरे पिता मेरे प्रति क्रोध रहित हो जाएं और जब मैं यहां से लौटकर घर जाऊं, तब वे मुझे पहचानकर पुत्रवत आचरण करें.
दूसरा वर मांगा- स्वर्ग के साधनभूत अग्नि ही स्वर्ग में अमृतत्त्व-देवत्व को प्राप्त करने में सहायक होते हैं. मैं उस अग्नितत्व का संपूर्ण रहस्य जानना चाहता हूं.
अल्पायु नचिकेता की तीव्र बुद्धि और अद्भुत जिज्ञासु आचरण से यमराज प्रसन्न हुए.
वह बोले- अग्नि अनन्त स्वर्ग-लोक की प्राप्ति का साधन है. यही विराट रूप से जगत की प्रतिष्ठा का मूल कारण है. उसे विद्वानों की बुद्धिरूप में स्थित मानिए.
यज्ञ की अग्नि प्रज्जवलित करने की सारी अव्यक्त विधियां समजाने के बाद यम ने द्वितीय वर स्वरूप कहा- ‘मैने जिस अग्नि का मर्म आपको बताया वह आपके ही नाम से प्रसिद्ध होगी. आप यह दिव्य रत्नों वाली माला भी ग्रहण करें.
अब तीसरा वर मांगिए. नचिकेता ने मांगा- आपने मुझे स्वर्ग का मार्ग बताया. आप मृत्यु के देवता हैं. आत्मा अदृश्य है. अत: मैं आपसे वही आत्मतत्व जानना चाहता हूं.
यम झिझके. उन्होने कहा- हे ऋषिकुमार आत्म-विद्या साधारण विद्या नहीं. अभी आप कुमार हैं. इसलिए इस विद्या के लिए समय उपयुक्त नहीं. आप चाहें तो इसके स्थान पर मनचाहा वर मांग लें.
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