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तेरी चर्चा होगी, वहाँ आने-जाने में मेरा उपयोग होगा तब भी मैं धन्य हो जाऊँगा। घोड़ा बनने की भी पुण्याई नहीं तो मुझे उसके घर का कुत्ता ही बना देना नाथ ! उसके हाथ का रूखा-सूखा टुकड़ा भी मिल जायेगा तो मैं पवित्र हो जाऊँगा और तेरी भक्ति भी हो जाएगी।”

तुलसीदासजी ने सच्चे हृदय से भगवान से प्रार्थना की। भगवान से नाता जुड़ गया। अन्तर्मुखता बढ़ी तो भगवान ने उनको तुलसीदास से भक्त कवि संत तुलसीदास बना दिया।

“तुलसी तुलसी क्या करो, तुलसी बन की घास। कृपा भयी रघुनाथ की, तो हो गये तुलसीदास।।”

भगवान को अपना मानना और अपने को भगवान का मानना यही वह भाव है जो व्रत, तप, तीर्थाटन करने से जो लाभ होता है, उससे कई गुना ज्यादा लाभ देता है. ईश्वर आपका है और आप ईश्वर के हैं, यह दृढ़ भावना रखिए।

जीवन में इस बात को चरितार्थ कर लीजिए, बेड़ा पार हो जायेगा। परमात्मा सर्वत्र है, सुलभ हैं, लेकिन ऐसे परमात्मा का अनुभव करानेवाले महात्मा दुर्लभ हैं। ऐसे महात्मा का संग मिल जाय तो जीवन में रंग आ जाये।

संकलनः विवेक शुक्ला
संपादनः राजन प्रकाश

(यह भक्तिकथा विवेक शुक्लाजी ने इंदौर से भेजी. विवेकजी स्वव्यवसायी हैं और धार्मिक चर्चाओं में गहरी रूचि लेते हैं. इनकी भेजी कथाएं प्रभु शरणम् में प्रकाशित होती रहती हैं.)

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