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उसकी तपस्या भी सिद्ध नहीं हो रही थी और भाई भी उसने खो दिया. वह निराश हो गया और उसने अग्नि में ही अपना सिर काटकर सौंप देने का निर्णय किया. रम्भ ने अपनी तलवार निकाल ली.

वह अपना सिर काटकर अग्नि में डालने ही वाला था कि अग्निदेव प्रकट हो गए. उन्होंने रम्भ से कहा- यह कैसी मूर्खता करने जा रहे हो? आत्महत्या से बड़ा कोई नीच कर्म नहीं होता. इस कर्म के कारण कई जन्मों में दुख भोगना पडता है.

रम्भ ने कहा- मैं जानता हूं कि आत्महत्या के कारण कई जन्मों तक मुझे नीच योनि भोगनी पड़ेगी किंतु मैं निराश हूं. अग्निदेव ने कहा- तुम्हारा तप पूर्ण हो चुका था. तुममें धैर्य का अभाव है. खैर, मांगो क्या मांगते हो?

हे देव आप प्रसन्न हैं तो मुझे ऐसे महाबली पुत्र का वरदान दीजिए जो तीनों लोक को जीतने वाला हो. मुझे ऐसा पुत्र चाहिए जिसके सामने शत्रुओं की सेना टिक न सके. देव, दानव, गंधर्व, मानव कोई उसे पराजित न कर सके.

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2 COMMENTS

  1. Its really very nice,
    I don’t have any word.u all of u doing a great job,please continue,gods blessing with u always.

    • आपके शुभ वचनों के लिए हृदय से कोटि-कोटि आभार.
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