January 28, 2026

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प्रागज्योतिषपुर में नरकासुर नामक राजा हुआ करता था. उसका एक नाम भौमासुर भी था. भौमासुर या नरकासुर पृथ्वी और भगवान नृसिंह की संतान था.

हिरण्याक्ष ने जब पृथ्वी को बंधक बना लिया था तब पृथ्वी का उद्धार करने के लिए भगवान विष्णु ने वराह अवतार लिया. वराह भगवान से पृथ्वी ने अपने साथ कुछ समय व्यतीत करने की विनती की जिसे भगवान ने मान लिया.

पृथ्वी के गर्भ से वराह भगवान का अंश था नरकासुर. जब लंका का राजा रावण मारा गया उस समय पृथ्वी के गर्भ से उसी स्थान पर नरकासुर का जन्म हुआ जहां माता सीता का जन्म हुआ था. सोलह वर्ष की आयु तक राजा जनक ने ही भौमासुर को पाला था.

बाद में पृथ्वी इसे ले गई और श्रीविष्णु ने इसे प्राग्ज्योतिषपुर का राजा बना दिया. नरकासुर मथुरा के राजा कंस का मित्र था. विदर्भ की राजकुमारी माया से इसका विवाह हुआ और विवाह के समय भगवान विष्णु ने इसे एक दुर्भेथ रथ दिया.

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कुछ दिनों तक तो नरकासुर ठीक से राज्य करता रहा किन्तु बाणासुर की संगति में पड़कर यह दुष्ट हो गया. महर्षि वसिष्ठ ने इसे विष्णु के हाथों मारे जाने का शाप दे दिया.
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