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राजा की जिज्ञासा और बढ़ गयी. पहाड़ी मार्ग पारकर बड़ी कठिनाइयों से राजा दूसरे महात्मा के पास पहुंचा किन्तु महात्मा को देखकर राजा हक्का बक्का रह गया. दृश्य ही कुछ ऐसा था. वे महात्मा अपना ही मांस चिमटे से नोच-नोचकर खा रहे थे.
राजा को देखते ही महात्मा डांटने लगे- मैं भूख से बेचैन हूं मेरे पास समय नहीं. आगे पहाड़ियों के पार एक आदिवासी गांव में एक बालक जन्म लेने वाला है जो कुछ ही देर तक जिन्दा रहेगा. सूर्योदय से पूर्व वहां पहुंचो. वही बालक तेरे प्रश्न का उत्तर का दे सकता है.
राजा बड़ा बेचैन हुआ. मेरे प्रश्न को उत्तर तो कोई देता नहीं सब आगे टाल देते हैं पर उत्सुकता प्रबल थी. कुछ भी हो यहां तक पहुंच चुका हूं. वहां भी जाकर देखता हूं क्या होता है.
राजा किसी तरह सुबह होने तक उस गांव में पहुंचा. उस दंपति के घर पहुंचकर सारी बात कही और शीघ्रता से बच्चा लाने को कहा. बालक को राजा के सम्मुख उपस्थित पेश किया गया.
राजा को देखते ही नवजात बालक हंसा और बोलने लगा- राजन्! मेरे पास भी समय नहीं है किन्तु अपना उत्तर सुनो लो. तुम, मैं और वे दोनों महात्मा जिनसे पूछकर यहां तक पहुंचे हो, पूर्वजन्म में हम चारों राजकुमार और सगे भाई थे.
एक बार शिकार खेलते-खेलते हम जंगल में भटक गए. तीन दिन तक भूखे प्यासे भटकते रहे. अचानक हम चारों को आटे की एक पोटली मिली. जैसे-तैसे हमने चार रोटी सेंकी.
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