January 29, 2026

अस्त्र त्यागने के हजारों वर्ष बाद शिवजी से क्यों भिड़ गए थे परशुरामः अनसुनी कथा

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पौराणिक कथाएँ, व्रत त्यौहार की कथाएँ, चालीसा संग्रह, भजन व मंत्र, गीता ज्ञान-अमृत, श्रीराम शलाका प्रशनावली, व्रत त्यौहार कैलेंडर इत्यादि पढ़ने के हमारा लोकप्रिय ऐप्प “प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प” डाउनलोड करें.
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परशुरामजी ने हैहयवंशी क्षत्रियों का वध क्यों किया यह कथा सर्वविदित है. आज मैं आपको श्रीपरशुरामजी की कुछ ऐसी कथाएं सुनाता हूं जो आपने शायद न सुनी हैं.

श्रीपरशुरामजी की कथा की शृंखला प्रभु शरणम् एप्प में चली थी जिसमें 15 भाग में हमने उनकी संक्षिप्त जीवनी, साधना और युद्धों का वर्णन किया था. उस शृंखला के पोस्ट में से ही ही एक कथा लेकर आए हैं. आप प्रभु शरणम् एप्प डाउनलोड कर लें. हम जल्द ही परशुरामजी की कथा शृंखला पुनः प्रकाशित करेंगे.

समंतपंचका में परशुरामजी ने अंतिम युद्ध लड़ा. यहीं पर हजारों क्षत्रपों की बलि दी और उनके खून से पांच तालाब भरे. यह सब करने के बाद उन्होंने अपना रक्तरंजित परशु धोया एवं शस्त्र नीचे रखे था. संहार और हिंसा से वे थक गये थे.

परशुरामजी ने 21 बार अभियान चला कर धरती के अधिकांश राजाओं को जीत लिया था. बहुत से भयभीत होकर उनके शरणागत थे. कुछ ने रनिवासों में छुपकर जान बचाई. कुछ ने ब्राह्मणों के घरों में आश्रय लिया और छुपकर रहे.

हैहयवंशीय वीतिहोत्र ने रनिवास में घुसकर जान बचाई थी. उसके वंश के कुछ पुरुष दधीचि के आश्रम में छिप गए. इस तरह उनकी जान बच पाई. पर अब ये भगोड़े क्षत्रप न रह गये थे.

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पृथ्वी के सातों द्वीपों पर अब परशुराम का एकछत्र राज था. एक तरह से पृथ्वी क्षत्रपों से खाली हो गई थी. परशुराम के सभी उद्देश्य पूरे हो चुके थे. भूमंडल पर राज्यों को जीतने के कारण उन्हें अश्वमेध यज्ञ का अधिकार प्राप्त हुआ.

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