हमारा फेसबुक पेज लाईक करें. [fblike]

इसके बाद गणेश चतुर्थी की यह संक्षिप्त व्रत कथा सुनें-

गणेश चतुर्थी व्रत की कथा आरंभ करते हुए गणेशजी माता पार्वती से कहते हैं- सर्वसिद्धिदायिनी में विधानपूर्वक गणेश पूजन करने से अनेक शुभफल प्राप्त होते हैं. गुरु परंपरा का पालन करते हुए हर महीने अलग-अलग नामों से मेरी आराधना करनी चाहिए.

वे नाम क्रमशः हैं- वक्रतुंड, एकदंत, कृष्णापिन्दाक्षम, गजवक्त्रं, लम्बोदरं, विकट, विघ्नाराजेंद्रम, धूम्रवर्ण, भाल्चंद्रम, विनायक, गणपति और गजानन.

गणेशजी माता पार्वती को संकष्टि चतुर्थी की कथा सुनाते हुए कहते हैं- सतयुग में नल नामक प्रतापी राजा थे और उनकी परम रूपवती पत्नी दमयंती थीं. भाग्यवश शाप के कारण नल का दमयंती से वियोग हो गया. उनकी पत्नी ने इस व्रत के प्रभाव से अपने पति को पुनः प्राप्त किया.

जगदंबा ने पार्वती से पुनः प्रश्न किया- हे पुत्र विनायक ! दमयंती ने किस विधि से उत्तम व्रत किया जिससे सातवें महीने में ही उसने अपने संतान के साथ पति को प्राप्त कर लिया.

अपनी माता के प्रश्न को सुनकर गणेशजी ने कहा- हे माता राजा नल दैवयोग से घोर विपत्ति में पड़ गए. हाथी घोड़े, धन-संपत्ति आदि सभी चल-अचल वस्तुओं का नाश हो गया.

मंत्री लोग छोड़कर चले गए. द्युत क्रीडा में हारे हुए व्यक्ति के समान राजा भी अपना सब कुछ गंवा चुके थे. अपने राज्य को नष्ट हुआ जानकर वह रानी दमयंती के साथ वन को चले गए.

जंगल में नल अनेक प्रकार की यातनाएं भोगते रहे और अंत में अपनी पत्नी के साथ भी उनका वियोग हो गया.

किसी नगर में जाकर नल किसी तरह अपना जीवन कष्टों में भरकर बिताने लगे. उनकी पत्नी अन्य स्थान पर भीख मांगते हुए घोर कष्ट का जीवन बिता रही थीं परस्पर वियोग में रहकर वे दोनों अपने कर्मो का फल भोग रहे थे.

शेष अगले पेज पर. नीचे पेज नंबर पर क्लिक करें.

2 COMMENTS

    • आपके शुभ वचनों के लिए हृदय से कोटि-कोटि आभार.
      आप नियमित पोस्ट के लिए कृपया प्रभु शरणम् से जुड़ें. ज्यादा सरलता से पोस्ट प्राप्त होंगे और हर अपडेट आपको मिलता रहेगा. हिंदुओं के लिए बहुत उपयोगी है. आप एक बार देखिए तो सही. अच्छा न लगे तो डिलिट कर दीजिएगा. हमें विश्वास है कि यह आपको इतना पसंद आएगा कि आपके जीवन का अंग बन जाएगा. प्रभु शरणम् ऐप्प का लिंक? https://goo.gl/tS7auA

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here