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गांव से काफी आगे निकल जाने पर साधु ने पेड से घोडा बांधा और फिर सो गया. प्रातः उठकर उसने नित्यकर्म निपटाया और वापस घोडे के पास आया तो फिर उसे रात की बातें याद आने लगीं.
उन्हें पछतावा हुआ-अरे! मैने यह क्या किया? एक साधु होकर मैने चोरी की? यह कुबुद्धि मुझे क्यों सुझी? उसने घोडा गृहस्वामी को वापस लौटाने का निश्चय किया और उल्टी दिशा में चल पडा.
गृहस्वामी से क्षमा मांगी और घोड़ा लौटा दिया. साधु ने सोचा कल मैंने इसके घर का अन्न खाया था, कहीं मेरी कुबुद्धि का कारण इस घर का अन्न तो नहीं?
जिज्ञासा से गृहस्वामी से पूछा- आप काम क्या करते हैं,आपकी आजिविका क्या है?’ सकुचाते हुए गृहस्वामी ने पहले टालने की कोशिश की फिर साधु जानकर सच्चाई बता दी.
वह बोला- महात्माजी मैं चोर हूँ और चोरी करके अपना जीवनयापन करता हूं’. साधु की शंका का समाधान हो गया. चोरी से जुटाया अन्न पेट में पहुंचा तो उसने मन में कुबुद्धि पैदा कर दी. प्रातः नित्यकर्म में उस अन्न के अंश बाहर आते ही सद्बुद्धि वापस लौटी.
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