मनु और शतरूपा ने ब्रह्मा के आदेश से पांच संतानों प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक पुत्र और आकूति, देवहुति एवं प्रसूति नामक कन्याओं को जन्म दिया.
आकूति का विवाह रूचि नामक प्रजापति से हुआ, देवहूति का कर्दम ऋषि से और प्रसूति का दक्ष प्रजापति से हुआ. इनसे संतति आगे बढ़ी.
कर्दम और देवहूति की नौ कन्याएं हुई थीं, जिनका विवाह ब्रह्मा ने नौ तेजस्वी ऋषियों से कराया. उनसे सारी सृष्टि के जीवों की उत्पत्ति हुई.
संसार निर्माण में इनका बड़ा योगदान है. इसलिए हम उनकी कथाएं संक्षेप में देने के स्थान पर बारी-बारी से सभी नौ ऋषियों की कथाएं अलग से प्रकाशित करेंगे ताकि आप विस्तार से समझ सकें.
नौ कन्याओं के बाद कर्दम और देवहूति को नारायण के अंश कपिलजी पुत्र के रूप में प्राप्त हुए जिनका वर्णन पिछली भागवत कथा में आया था.
तो मनु-शतरूपा द्वारा संतति बढ़ाने और उनके वंश से उत्पन्न संतानों के प्रसंग को विराम देते हैं और भागवत कथा आगे बढ़ाते हैं.
मनु और शतरूपा की तीसरी पुत्री प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति से हुआ था. प्रसूति और दक्ष की एक पुत्री सती का विवाह भगवान शिव से हुआ.
एक बार दक्ष ने विशाल यज्ञ कराया. भृगु इसके मुख्य पुरोहित थे. सभी देवता, ब्रह्मा, विष्णु और महेश उसमें पधारे. जब दक्ष आए तो सब ने उठकर अभिवादन किया.
ब्रह्मा और भोलेनाथ नहीं उठे. इससे दक्ष को बड़ा अपमान महसूस हुआ. ब्रह्मा उनके पिता थे इसलिए उनका नहीं उठना तो दक्ष ने मान लिया लेकिन शिवजी तो उनके दामाद थे.
दक्ष ने यज्ञशाला में शिवजी को बुरा-भला कहा और घोषणा की कि आगे से किसी यज्ञ में शिवजी का भाग नहीं होगा. इस पर शिवगण नन्दी बहुत क्रोधित हुए.
नंदी ने दक्ष को शाप दिया कि जिस मुख से उन्होंने महादेव का अपमान किया वह बकरे का हो जाएगा. दक्ष के सहयोगियों को भोजन के लिए भीख पर आश्रित होना पड़ेगा.
भृगु दक्ष के सहयोगी और यज्ञ के पुरोहित थे. उन्होंने भी शाप दिया कि शिवभक्त शास्त्रों के विरूद्ध कार्य करने वाले, पाखंडी और सुरापानी (शराबी) हो जाएं.
महादेव यज्ञ में इस तरह के व्यवहार और एक दूसरे को शाप देता देखकर खिन्न हो गए और बिना किसी को कुछ कहे वहां से चले गए.
दक्ष ने महादेव का अपमान करने की ठान रखी थी. उन्होंने एक और यज्ञ का आयोजन किया जिसमें शिव और सती को निमंत्रित नहीं किया गया.
सती का यज्ञ में जाने का मन था किन्तु शिवजी ने मना किया. उन्होंने सती से कहा- आपके पिता यह यज्ञ मुझे अपमानित करने के लिए करा रहे हैं. आप वहां न जाएं. आपका अपमान होगा और मैं आपको खो दूंगा.
किन्तु सती अपने को रोक न सकीं और चली गयीं. वहां उन्होंने दक्ष द्वारा शिवजी के बारे में कहे गए अपशब्द सुने और खुद को अपमानित महसूस किया.
सती बोलीं- जो भी शिवभक्त हैं, उनमें यदि शक्ति है तो वह अपने प्रभु की निंदा करने वालों को दंड दें अन्यथा यहां से चले जाएं.
फिर उन्होंने दक्ष से कहा- मुझे यह शरीर आपने ही दिया है. इसी शरीर ने शिव का अपमान सुना है. सो मैं यह शरीर त्यागती हूं. इतना कहकर सती ने योग से अग्नि प्रज्ज्वलित कर अपना शरीर भस्म कर लिया.
यह देखकर शिवगण क्रोधित होकर दक्ष पर लपके किन्तु भृगुजी ने यज्ञ की अग्नि से यज्ञ रक्षक उत्पन्न किए जिन्होंने शिवगणों को खदेड़ दिया.
नारद ने यह सब घटना शिवजी को बताई. क्रोधित महादेव ने अपनी जटाओं से एक बाल तोड़ कर धरती पर फेंका और भयंकर वीरभद्र को प्रकट कर दिया.
वीरभद्र शिवगणों को लेकर यज्ञशाला पहुंचे और यज्ञ तहस-नहस कर दिया. जिन लोगों ने शिव का यज्ञ में अपमान किया था, उन्हें दंडित किया. वीरभद्र ने दक्ष की गर्दन काट दी.
यज्ञ का नाश होता देखकर ऋषियों और देवताओं ने ब्रह्मा और विष्णु से शिवजी को शांत कराने की विनती की.
देवताओं समेत ब्रह्मा और विष्णु शिवजी के पास आए. ब्रह्मा ने शिव को कहा- यज्ञ अधूरा रह गया है. आपके कोप से संसार नष्ट होने की आशंका है. आप शांत हो जाएं.
शिवजी यज्ञशाला में आये और दक्ष के शरीर पर बकरे का सर जोड़ कर उन्हें पुनर्जीवित किया. अहंकार नष्ट हो जाने पर दक्ष ने महादेव से क्षमा मांगी और यज्ञ पूर्ण किया.
इस यज्ञ के दौरान महादेव की पत्नी सती शरीर छोड़ चुकी थीं. दुखी होकर महादेव अनंत काल के लिए योगनिद्रा में चले गए.