हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.
[sc:fb]

वही नैमिषारण्य जहां रोमहर्षण को व्यासपीठ पर बिठाकर सम्मानित किया गया था. बलरामजी को तो वस्तु स्थिति पता नहीं. अचानक पहुंचे थे इसलिए इस यज्ञ सत्र में उन्होंने देखा कि मन्त्र-पाठ तथा यज्ञाहुति के बाद सारे ऋषिगण एक मण्डप के नीचे बैठे हैं और सूत जाति का एक व्यक्ति ऊंचे व्यास गद्दी पर बैठा पुराण-कथा कह रहा है.

बलभद्र के उस मण्डप में पधारने पर सारे ऋषिगणों ने खड़े होकर उनका सम्मान किया पर व्यास आसन पर बैठे रोमहर्षण ऐसा नहीं कर सकते थे क्योंकि वह संकल्प में थे. व्यासपीठ पर बैठा व्यक्ति प्रभु के अतिरिक्त किसी अन्य के लिए वंदनाभाव में नहीं आ सकता. रोमहर्षण का ऐसा व्यवहार बलराम को उद्दण्डतापूर्ण तथा अहंकार से भरा लगा.

एक सूतपुत्र के ऊँची व्यास गद्दी पर बैठकर विद्वान ऋषियों के समक्ष प्रवचन को ही वह नहीं समझ पा रहे थे ऊपर से उन्हें यह भी लगा कि अपमान भी किया जा रहा है. मेरे सम्मान में जब इतने बड़े ऋषि-मुनि उठ गए पर यह तो अपने आसन से हिला तक नहीं. बलभद्र को यह सहन नहीं हुआ.

 

शेष अगले पेज पर. नीचे पेज नंबर पर क्लिक करें.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here