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व्यासजी ने कहा- ऋषियो, विद्या को किसी जाति से मत बांधना. ऐसा करने से विद्यादेवी की उपेक्षा होती है. आप गुणग्राही बनिए, जाति मत देखिए. रोमहर्षण ने अपने स्वाध्याय से वह विद्या प्राप्त की है जो जाति बंधन से परे है. उससे ज्यादा योग्य और कोई इस पीठ के लिए अभी यहां नहीं है.
ऋषियों की समझ में बात आ गयी. शौनकजी ने स्वयं सूत जाति के रोमहर्षण से पुराण-कथा सुनने के लिए उन्हें ऊंचे आसन पर बिठाया जिसे व्यास गद्दी कहा जाने लगा.
इस प्रकार रोमहर्षण खाली समय में पुराण कथाएं सुनाने लगे. जिस समय यह यज्ञ हो रहा था, उसी समय महाभारत की तैयारी शुरू हो गई थी.
भगवान कृष्ण तो पाण्डवों के पक्ष में इस शर्त पर हो गये कि वह युद्ध में सलाह तो देंगे, पर हथियार नहीं उठाएंगे. उनके बड़े भाई बलभद्र के सामने बड़ी उलझन आ गई. दुर्योधन उनका सबसे प्रिय शिष्य था. उन्होंने दुर्योधन को गदायुद्ध का प्रशिक्षण दिया था. वह निर्णय नहीं कर पा रहे थे कि शिष्य की सहायता की याचना को कैसे मना करेंगे.
दुर्योधन प्रिय शिष्य है तो अर्जुन बहनोई. अर्जुन के विरूद्ध जाता हूं तो बुआ कुंती और बहन सुभद्रा दोनों को अच्छा न लगेगा.
बलभद्र ने सोचा-श्रीकृष्ण ने तो घोषणा कर दी है कि वह पाण्डवों के पक्ष में युद्ध करेंगे नहीं. उनके कारण शिष्य दुर्योधन का कोई अहित होगा नहीं. परंतु अर्जुन को अपनी बहन ब्याही है, इसलिए उसके विरूद्ध भी युद्ध करना उचित न होगा. मैं तटस्थ रहूँगा वही ज्यादा ठीक है.
यहां द्वारका में रहने से न जाने कैसी समस्या आ जाय. न जाने कैसा दबाव आए और युद्ध की उत्कंठा पैदा हो मन में. इसलिए अच्छा है कि कहीं निकल जाया जाए.
बलराम जी तीर्थों के दर्शन के लिए निकल गए. तीर्थों में घूमते-घामते वे नैमिषारण्य पहुंचे.
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