January 28, 2026

सुतीक्ष्ण की गुरूदक्षिणा पूरी करने स्वयं उन तक आ पहुंचे श्रीराम


लेटेस्ट कथाओं के लिए प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प डाउनलोड करें।
आप बिना इन्टरनेट के व्रत त्यौहार की कथाएँ, चालीसा संग्रह, भजन व मंत्र , श्रीराम शलाका प्रशनावली, व्रत त्यौहार कैलेंडर इत्यादि पढ़ तथा उपयोग कर सकते हैं.इसके लिए डाउनलोड करें प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प.
Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
[sc:mbo]
सुतीक्ष्ण महर्षि अगस्त्य के शिष्य सुतीक्ष्ण थे. गुरु-आश्रम में रहकर अध्ययन करते थे. अध्ययन समाप्त होने पर एक दिन गुरूजी ने कहा- तुम्हारा अध्ययन समाप्त हुआ, अब तुम विदा हो सकते हो.

सुतीक्ष्ण ने कहा- गुरुदेव! मैं गुरुदक्षिणा के रूप में क्या दूं जो आपको प्रिय हो. आप मेरे लिए कुछ आज्ञा करें.

अगस्त्य ने कहा- तुमने मेरी बहुत सेवा की है. तुम्हारे जैसा श्रेष्ठ गुरुभक्त शिष्य मिलना भी एक बड़ी बात है. सेवा से बढकर कोई भी गुरुदक्षिणा नहीं, अत: जाओ, सुखपूर्वक रहो.

सुतीक्ष्ण ने आग्रहपूर्वक कहा- गुरुदेव! बिना गुरुदक्षिणा दिए शिष्य की विद्या फलीभूत नहीं होती. सेवा तो मेरा धर्म ही है. आप किसी अत्यंत प्रिय वस्तु के लिए आज्ञा अवश्य करें.

अगस्त्य ने कि इस निष्ठावान शिष्य की परीक्षा जरूर लेने चाहिए. उन्होंने कहा- सुतीक्ष्ण तुम गुरुदक्षिणा के रूप में मुझे सीतारामजी को साक्षात मेरे आश्रम में लाकर दो.

शेष अगले पेज पर. नीचे पेज नंबर पर क्लिक करें.

See also  भक्त के लिए विधि का विधान बदल देते भगवान, दिनभर हरिनाम रटने वाले नारद से ज्यादा एक महात्मा को मिला सम्मानः रोचक हरिकथा
Share: