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सतीजी द्वारा देवी सीता बनकर श्रीरामजी की परीक्षा लेने के कारण भोलेनाथ व्यथित हैं और धर्मसंकट में पड़े हैं. श्रीराम उनके आराध्य हैं. सती ने अज्ञानतावश कुछ काल के लिए आराध्य की भार्या का रूप धरा इस तरह वह उनके लिए पूजनीय हो गईं.
महादेव को उलझन है कि श्रीराम उनके आराध्य और गुरू हैं. गुरू की अर्धागिंनी तो मातृवत पूजनीय हुईं. अब वह सती के प्रति पत्नी का प्रेम कैसे रख सकते हैं. इससे भक्ति की भावना का खंडन होता है.
शास्त्र गुरूपत्नी के सिर्फ चरणों के दर्शन का आदेश करते हैं. इसलिए इस तन के साथ तो अब सती और महादेव का धर्मविरूद्ध मिलन संभव ही नहीं.
दोहाः
परम पुनीत न जाइ तजि किएँ प्रेम बड़ पापु।
प्रगटि न कहत महेसु कछु हृदयँ अधिक संतापु॥56॥
सती परम पवित्र हैं, इसलिए इन्हें छोड़ते भी नहीं बनता और प्रेम करने में बड़ा पाप है. महादेवजी स्पष्ट रूप से कुछ भी नहीं कह रहे, परन्तु उनके हृदय में बड़ा संताप है.
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