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वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम्‌।
यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते ॥3॥
भावार्थ:- ज्ञानमय, नित्य, शंकररूपी गुरु की मैं वन्दना करता हूं. इनके आश्रय में आकर टेढ़ा होने के बावजूद चन्द्रमा भी सर्वत्र वंदनीय हो जाता है.

सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ।
वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ ॥4॥

भावार्थ:- श्री सीतारामजी गुणों के भंडार हैं. उनके गुणरूपी पवित्र वन में निरंतर विहार करने वाले, झानसम्पन्न कविश्रेष्ठ श्री वाल्मीकिजी और कपीश्वर श्री हनुमानजी की मैं वन्दना करता हूं.

उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्‌।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्‌॥5॥

भावार्थ:- सृजन, पालन और संहार करने वाली, दुखों को हरने वाली तथा सम्पूर्ण कल्याण प्रदान करने वाली श्री रामचन्द्रजी की प्रियतमा श्रीसीताजी को मैं प्रणाम करता हूं.

यन्मायावशवर्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा
यत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः।
यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां
वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्‌॥6॥

भावार्थ:-जिनकी माया से सम्पूर्ण विश्व, ब्रह्मादि देवता और असुर वशीभूत हैं, जिनकी महिमा से रस्सी में सर्प के भ्रम की भांति यह सारा जगत सत्य ही प्रतीत होता है और जिनके केवल चरण ही भवसागर से तरने की इच्छा वालों के लिए एकमात्र नौका हैं, उन समस्त कारणों से सबसे श्रेष्ठ राम कहलाने वाले भगवान श्रीहरि की मैं वंदना करता हूं.

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