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उसने अपना शरीर एक योजन लम्बे पर्वत के समान विशाल बनाया और मार्ग में लेट गया. अघासुर का यह रूप देखकर बालकों को भ्रम हुआ कि शायद यह भी वृंदावन की कोई सुंदर वस्तु है.

उसका मुंह किसी गुफा की तरह दिखता था. बाल-ग्वाल उसे समझ न सके और कौतुकवश उसे देखने लगे. अघासुर की जीभ उन्हें लाल रंग की सुंदर राह दिखाई देती थी. उन्हें इस पर चलने की इच्छा हुई.

हालांकि कुछ बच्चों के मन में भय भी हुआ कि कहीं यह कोई माया न हो जो उनका अहित करने आई हो लेकिन सभी कहने लगे कि कन्हैया के होते क्या डरना. जब उसने उतने विशाल बक को चीर दिया तो ऐसी छोटी-मोटी बाधाएं क्या हैं!

बात सही भी थी. जब स्वयं प्रभु सखा रूप में साथ हों तो भय की किया बात. प्रभु ने भी वह बात सुनी. वह तो समझ गए थे कि उनके साथी काल के मुख में प्रवेश कर रहे हैं लेकिन जब आस्था पक्की हो तो प्रभु को उसकी लाज भी रखनी पड़ती हैं.

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