नंदीश्वर या नंदी शिवजी के द्वारपाल हैं. उनकी मूर्ति हर मंदिर में होती है. वह भी एक प्रकार से शिव परिवार के सदस्य जैसे ही हैं. पर क्या आपको पता है कि शिवजी के नंदीश्वर के अतिरिक्त एक अन्य द्वारपाल भी हैं.
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आपको आज कथा सुनाता हूं कि यहां शिवजी का अपने एक भक्त से वाद-विवाद हुआ था. फिर उसपर प्रसन्न होकर भगवान ने नंदी के साथ दूसरा द्वारपाल नियुक्त किया था. आइए आनंद लें शिवकथा का.
माटी नामका एक बड़ा शिवभक्त था. उसने संतान प्राप्ति के लिए 100 साल तक शिवजी का कठोर तप किया था. शिवजी ने उसे संतान का वरदान दिया. समय आने पर उसकी पत्नी गर्भवती हुई. पत्नी का प्रसव चार साल तक नहीं हुआ तो माटी को बड़ी चिंता हुई.
पता चला कि गर्भ का बालक कालमार्ग नामक राक्षस के डर से बाहर ही नहीं निकल रहा. माटी ने सोचा कि क्यों न गर्भ में स्थित शिशु को शिवज्ञान दे दिया जाए. उसने शिशु को शिवज्ञान देना शुरू किया जिससे शिशु को बोध हुआ और वह बाहर निकला.
माटी ने कालमार्ग से डरने के कारण अपने पुत्र का नाम रखा कालभीति. कालभीति जन्म से ही परम शिव भक्त थे. बड़े होते ही कालभीति घोर तपस्या में लगे.
बेल के पेड़ के नीचे पैर के अंगूठे पर खड़े हो वह सौ वर्षों तक एक बूँद भी पानी पिये बिना मंत्रों का जप करते रहे. सौ वर्ष पूरे होने पर एक दिन एक आदमी जल से भरा हुआ घड़ा लेकर वहां आया. कालभीति को नमस्कार कर उसने कहा कि जल ग्रहण कीजिए.
कालभीति बोले– आप किस वर्ण के हैं, आप का आचार-व्यवहार कैसा है? यह सब जाने बिना मैं जल नहीं पी सकता.
पानी लाने वाला आगंतुक बोला- मैं जब अपने माता पिता को ही नहीं जानता तो अपने वर्ण का क्या कहूं? आचार-विचार और धर्मों से मेरा कोई वास्ता ही नहीं रहा है.
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